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आदिवासी समाज की साझी संस्कृति और सामुदायिक जीवन आज भी पूरे समाज को प्रेरणा देता है” — डॉ. ज्यां द्रेज़

विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर कोल्हान विश्वविद्यालय में विशेष समारोह

आदिवासी समाज की साझी संस्कृति और सामुदायिक जीवन आज भी पूरे समाज को प्रेरणा देता है” — डॉ. ज्यां द्रेज़

विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर कोल्हान विश्वविद्यालय में विशेष समारोह

चाईबासा- विश्व आदिवासी दिवस (9 अगस्त) की पूर्व संध्या पर कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा में शनिवार को विशेष समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र विभाग, इतिहास विभाग, भूगर्भ विभाग एवं भूगोल विभाग के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. (डॉ.) अंजिला गुप्ता ने की।
समारोह में मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. जानुम सिंह सोय, सम्मानित अतिथि प्रख्यात अर्थशास्त्री एवं सामाजिक चिंतक डॉ. ज्यां द्रेज़, विशिष्ट अतिथि साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित श्री भोगला सोरेन एवं श्री अनुपम पूर्ति उपस्थित रहे। विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. अमर कुमार, शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा विभिन्न समाजों से आए गणमान्य अतिथियों ने कार्यक्रम में सहभागिता की।
अपने संबोधन में पद्मश्री डॉ. जानुम सिंह सोय ने हो भाषा में वक्तव्य दिया। उन्होंने युवाओं से अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने का आह्वान किया तथा हो गीत के माध्यम से युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दिया।
डॉ. ज्यां द्रेज़ ने आदिवासी समाज की सामाजिक संरचना पर विचार रखते हुए कहा कि आदिवासी समाज में ऊंच-नीच और अनावश्यक सामाजिक पदानुक्रम की भावना नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज भी आदिवासी समाज अपनी साझी संस्कृति, सामुदायिक जीवन और सामूहिक मूल्यों के माध्यम से पूरे समाज को प्रेरित करता है।
साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भोगला सोरेन ने वैश्वीकरण के दौर में आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति और सामुदायिक जीवन पर पड़ रहे प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और सामुदायिक मूल्यों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
चित्रकला प्रदर्शनी और ‘सुकुन बुरु’ प्रस्तुति रही विशेष आकर्षण
समारोह के दौरान आयोजित चित्रकला एवं आदिवासी कला-संस्कृति की प्रदर्शनी को अतिथियों एवं उपस्थित लोगों ने खूब सराहा। गैलरी में श्री अनुपम पूर्ति, डॉ. अभिजीत मुंडा, श्री हरे कृष्णा तथा श्री रवि मुंडू द्वारा प्रस्तुत चित्रों एवं कलाकृतियों ने विशेष आकर्षण पैदा किया। प्रदर्शनी के माध्यम से आदिवासी जीवन, प्रकृति, संस्कृति और सामुदायिक संबंधों के विविध आयामों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।
श्री अनुपम पूर्ति ने अपनी ‘सुकुन बुरु’ प्रस्तुति के माध्यम से आदिवासी जनजीवन और प्रकृति के बीच के गहरे एवं जीवंत संबंध को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि आदिवासी जीवन-दृष्टि में प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. (डॉ.) अंजिला गुप्ता ने कहा कि कोल्हान विश्वविद्यालय आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति, कला, परंपराओं एवं पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरंतर प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का प्रयास है कि इन समृद्ध ज्ञान परंपराओं को शिक्षा, शोध और अकादमिक विमर्श से जोड़ा जाए तथा युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से परिचित कराया जाए।
कार्यक्रम की संयोजक डॉ. मीनाक्षी मुंडा एवं सह-संयोजक डॉ. अरविंद कुमार रहे। धन्यवाद ज्ञापन रिंकी दोराई ने किया।
समारोह का आयोजन वीर शहीद पोटो हो सभागार में किया गया। कार्यक्रम ने विश्व आदिवासी दिवस के मूल संदेश—आदिवासी समुदायों के अधिकार, गरिमा, भाषा, संस्कृति, पहचान एवं पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण—को अकादमिक एवं सामाजिक विमर्श से जोड़ने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया।

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