सीजेपी छात्र आंदोलनः मीडिया के विश्वनियता पर उठते सवाल – धर्मेंद्र कुमार
मई 2026 में सुप्रीमकोर्ट की एक टिप्पणी के विरोध में शुरू हुआ 'सीजेपी' (कॉकरोच जनता पार्टी) आंदोलन भारतीय इतिहास में डिजिटल क्रांति का एक अभूतपूर्व उदाहरण बन चुका है। महज दो महीनों के भीतर इस आंदोलन ने देश के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा करा दिया और सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इस आंदोलन की सफलता और इसके सफर को समझने के लिए सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया-सरकार के गठजोड़ की भूमिका को समझना बेहद जरूरी है

सीजेपी छात्र आंदोलनः मीडिया के विश्वनियता पर उठते सवाल
– धर्मेंद्र कुमार
मई 2026 में सुप्रीमकोर्ट की एक टिप्पणी के विरोध में शुरू हुआ ‘सीजेपी’ (कॉकरोच जनता पार्टी) आंदोलन भारतीय इतिहास में डिजिटल क्रांति का एक अभूतपूर्व उदाहरण बन चुका है। महज दो महीनों के भीतर इस आंदोलन ने देश के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा करा दिया और सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इस आंदोलन की सफलता और इसके सफर को समझने के लिए सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया-सरकार के गठजोड़ की भूमिका को समझना बेहद जरूरी है।
सोशल मीडिया की भूमिका
सीजेपी आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत इसका पूरी तरह से डिजिटल और विकेंद्रीकृत होना रहा। जब पारंपरिक रास्तों ने युवाओं को निराश किया, तब सोशल मीडिया उनका सबसे बड़ा हथियार बना। सीजेपी के संयोजक एवं राजनीतिक रणनीतिकार अभिजीत दीपके द्वारा शुरू किए गए इस आंदोलन ने इंस्टाग्राम पर कुछ ही दिनों में 3 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स का आंकड़ा पार कर लिया। रील्स और मीम्स के माध्यम से गंभीर राजनीतिक संदेशों को बेहद सरल और व्यंग्यात्मक तरीके से युवाओं तक पहुंचाया गया। मुख्यधारा के टीवी चैनलों ने जब शुरुआत में इस आंदोलन को पूरी तरह नजरअंदाज किया, तब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने सूचना के प्रसार को रुकने नहीं दिया। जंतर-मंतर से होने वाली हर हलचल, सोनम वांगचुक के अनशन के अपडेट और पुलिस की कार्रवाइयों को सीधे एक्स (X), यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर लाइव ब्रॉडकास्ट किया गया। दिल्ली की भीषण गर्मी में जंतर-मंतर पर डटे छात्रों के लिए पानी, भोजन, टेंट और मेडिकल सहायता की व्यवस्था सोशल मीडिया पर की गई अपीलों और डिजिटल फंडिंग के जरिए ही संभव हो सकी। यह सोशल मीडिया का ही प्रभाव था कि प्रधानमंत्री को देर रात रिल्स के माध्यम से छात्रों तक अपनी संदेश पहुंचाने के लिए मजबूर कर दिया।
मुख्यधारा की मीडिया और सरकार का गठजोड़
इस छात्र आंदोलन के दौरान एक बार फिर मुख्यधारा की मीडिया और सत्ता का वह गठजोड़ खुलकर सामने आया, जिसे आम बोलचाल में ‘गोदी मीडिया’ कहा जाता है। इस गठजोड़ ने आंदोलन को विफल करने के लिए कई स्तरों पर प्रयास किया। शुरुआत के कई हफ्तों तक जब जंतर-मंतर पर हजारों छात्र नीट (NEET) पेपर लीक और बेरोजगारी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे, तब प्रमुख नेशनल न्यूज चैनलों के प्राइम टाइम से यह मुद्दा पूरी तरह गायब था। मीडिया ने इसे “कुछ भटके हुए छात्रों का छोटा प्रदर्शन” दिखाकर दबाने की कोशिश की। जब आंदोलन को अनदेखा करना नामुमकिन हो गया, तब मीडिया के एक हिस्से ने सरकार के इशारे पर छात्रों को प्रदर्शनकारी ‘अराजक तत्व’, ‘विपक्ष के मोहरे’ और ‘देश विरोधी’ साबित करने की पूरजोर कोशिश की। सरकार के मंत्रियों के बयानों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया ताकि आम जनता की सहानुभूति छात्रों से हट जाए। जब छात्रों ने अपनी 5-सूत्रीय मांगों और शिक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दे पर अड़े थे। तब टीवी चैनलों पर गैर-जरूरी और सांप्रदायिक बहसों के जरिए देश का ध्यान भटकाने का प्रयास किया जाता रहा ताकि सीजेपी के आंदोलन पर से दबाव कम हो सके।
डिजिटल नैरेटिव की जीत और सरकार का आत्मसमर्पण
मुख्यधारा की मीडिया और सरकार का यह गठजोड़ इस बार इसलिए फेल हो गया क्योंकि युवाओं ने सूचना के स्रोत पर से टीवी चैनलों का एकाधिकार समाप्त कर दिया था। जब सोशल मीडिया पर आक्रोश का सैलाब थमा नहीं और सोनम वांगचुक के अनशन तथा सीजेपी के कड़े रुख के कारण वैश्विक स्तर पर सरकार की किरकिरी होने लगी, तब सरकार को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी। नैरेटिव की इस लड़ाई में सोशल मीडिया ने मुख्यधारा की मीडिया को पूरी तरह अप्रासंगिक बना दिया। नतीजतन, सरकार को तीसरे दौर की वार्ता में न सिर्फ सीजेपी की सभी प्रमुख शर्तें माननी पड़ीं, बल्कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा भी देना पड़ा और छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने का लिखित आश्वासन देना पड़ा।
सीजेपी छात्र आंदोलन ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक लोकतंत्र में यदि मुख्यधारा की मीडिया सरकार के साथ गठजोड़ करके जनता की आवाज को दबाने का काम करेगी, तो जनता सोशल मीडिया के जरिए अपना समानांतर मीडिया खड़ा कर लेगी। यह आंदोलन भविष्य के जन-आंदोलनों के लिए एक ब्लूप्रिंट है, जो बताता है कि तकनीक और युवा एकजुटता के सामने बड़े से बड़ा सत्ता-मीडिया गठजोड़ भी ढह जाता है।

