बांकीपुर उपचुनाव: क्या प्रशांत किशोर खोल पाएंगे “जनसुराज” का खाता -धर्मेंद्र कुमार
बिहार की राजनीति में 30 जुलाई 2026 को होने वाले बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं है। यह उपचुनाव जहां प्रशांत किशोर के लिए राजनीतिक परीक्षा है वहीं बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई। पीके यदि यहां सेंधमारी कर पाते हैं तो यह न केवल जन सुराज की पुनर्जीवन यात्रा होगी बल्कि बिहार की राजनीति में बीजेपी की अजेयता पर भी सवाल खड़े होंगे। हालांकि, बीजेपी का दशकों पुराना संगठनात्मक ढांचा और जातीय समीकरण अभी भी उसके पक्ष में है

बांकीपुर उपचुनाव: क्या प्रशांत किशोर खोल पाएंगे “जनसुराज” का खाता -धर्मेंद्र कुमार
बिहार की राजनीति में 30 जुलाई 2026 को होने वाले बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं है। यह उपचुनाव जहां प्रशांत किशोर के लिए राजनीतिक परीक्षा है वहीं बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई। पीके यदि यहां सेंधमारी कर पाते हैं तो यह न केवल जन सुराज की पुनर्जीवन यात्रा होगी बल्कि बिहार की राजनीति में बीजेपी की अजेयता पर भी सवाल खड़े होंगे। हालांकि, बीजेपी का दशकों पुराना संगठनात्मक ढांचा और जातीय समीकरण अभी भी उसके पक्ष में हैं। असली सवाल येही है कि क्या प्रशांत किशोर जनता को यह विश्वास दिला पाएंगे कि वे सिर्फ रणनीतिकार ही नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय जननेता भी हैं? अब देखना दिलचस्प होगा कि 2025 में शून्य पर आउट हुई जनसुराज, क्या बीजेपी के गढ़ में खाता खोल पाएगी?
बांकीपुर का गणित
बांकीपुर 40 साल से बीजेपी की सीट रही है। पूर्व विधायक नितिन नवीन अब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उनके इस्तीफे से ही ये सीट खाली हुई है। ये सीट कायस्थ बहुल मानी जाती है। सवर्ण + शहरी वोटर + व्यापारी वर्ग यहां निर्णायक भूमिका में है। वहीं जनसुराज का दावा है कि बांकीपुर विधानसभा में 30 साल में कोई विकास नहीं हुआ। पटना के 114 स्लम में से 64 अकेले बांकीपुर में हैं। पीके इसी “एंटी-इनकंबेंसी” को भुनाना चाहते हैं। वहीं अंतिम समय में बीजेपी द्वारा अपने उम्मीदवार अभिषेक बंटी को बदलना और नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाए जाने की खूब चर्चा है। नीरज कायस्थ जाति से आते है। बांकीपुर विधानसभा में कायस्थ जाति की जनसंख्या लगभग 23 प्रतिशत है, जो बीजेपी का एक मजबूत आधार है।
त्रिकोणीय मुकाबला
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना है। बीजेपी द्वारा अभिषेक कुमार के स्थान पर नीरज सिन्हा को उम्मीदवार बनाए जाने से यह मुकाबला दिलचस्प होगा। भाजपा के लिए ये प्रतिष्ठा का सवाल है। वहीं राजद ने रेखा कुमारी गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है। रेखा का दावा है “इस बार उसकी जीत पक्की है”। जबकि जनशक्ति जनता दल ने सोशल एक्टिविस्ट वीणा मानवी को उतारा है। 2025 में पीके ने चुनाव नहीं लड़ा था। अब पहली बार खुद मैदान में हैं। शहरी, शिक्षित युवा वोटर उन्हें “विकल्प” के तौर पर देख रहा है। पीके पिछले कई दिनों से बांकीपुर में जनसंपर्क कर रहे हैं। उनका कहना है कि “अगर सरकार से नाखुश हैं तो वोट से संदेश भेजिए”। वहीं किशोर ने कहा है “अगर भाजपा को हराना है तो महागठबंधन हमारा समर्थन करे”। अगर वोट नहीं बंटा तो मुकाबला कड़ा हो सकता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2025 विधानसभा में एक भी सीट नहीं जीत पाई जनसुराज पार्टी जमीनी स्तर पर अभी भी कमजोर है। पीके के खिलाफ 8 आपराधिक मामले लंबित हैं। हालांकि किसी में आरोप तय नहीं हुए। ठीक वोटिंग से 2 दिन पहले 28 जुलाई को उन्हें कोर्ट में पेश होना है। दूसरी ओर 40 साल से न हारी हुई बीजेपी इस चुनाव को प्रतिष्ठा का चुनाव मान रही है।
तो क्या पीके का खाता खुलेगा?
अगर शहरी नाराज वोटर + युवा + एंटी भाजपा वोट एकजुट होकर पीके के साथ आ जाएं और वोट नहीं बंटा तो जनसुराज की जीत सुनिशचित है। विश्लेषकों का मानना है “विपक्ष साथ दे तो पीके की जीत की संभावना अधिक है”। लेकिन अगर वोट बंटा और बीजेपी का कोर वोटर एकजुट रहा तो जनसुराज फिर पिछड़ सकती है।
बांकीपुर उपचुनाव प्रशांत किशोर के लिए “सेमीफाइनल” है। जीत गए तो जनसुराज को विधानसभा में पहली सीट + नैरेटिव मिलेगा। हार भी गए पर 2 लाख वोट ले आए तो 2029 के लिए नींव पक्की होगी। राजनीति में “खाता खोलना” का मतलब सिर्फ जीत नहीं बल्कि मजबूती से मैदान में डटे रहना ङी होता हैं।। बांकीपुर की जनता 30 जुलाई को तय करेगी कि प्रशांत किशोर सिर्फ चुनाव जितवाने वाले रणनीतिकार रहेंगे, या खुद सियासत के सुपरस्टार बनेंगे। एक बात तय है कि भाजपा के गढ़ में घुसकर लड़ने की हिम्मत पीके ने दिखाई। अब परिणाम क्या होगा, ये 3 अगस्त को पता चलेगा।


