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पंजाब 95/सतलुज: कला, सेंसरशिप और लोकतंत्र का आईना -धर्मेंद्र कुमार

भारतीय सिनेमा में राजनीतिक विषयों पर बनी फिल्मों का सफर हमेशा आसान नहीं रहा है। इसका ताज़ा उदाहरण है 90 के दशक में पंजाब में उग्रवाद आंदोलन विषय पर बनी फिल्म ‘सतलुज’, जो मूल रूप से ‘पंजाब ’95’ नाम से जानी जाती थी। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की जिंदगी और संघर्षों पर आधारित है। खालरा ने पंजाब में उग्रवाद के दौर में जबरन गायब किए गए लोगों और उनके गुप्त अंतिम संस्कारों का पर्दाफाश किया था। उनकी जांच ने न केवल पंजाब पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की जवाबदेही पर भी बहस छेड़ दी

पंजाब 95/सतलुज: कला, सेंसरशिप और लोकतंत्र का आईना
–धर्मेंद्र कुमार
भारतीय सिनेमा में राजनीतिक विषयों पर बनी फिल्मों का सफर हमेशा आसान नहीं रहा है। इसका ताज़ा उदाहरण है 90 के दशक में पंजाब में उग्रवाद आंदोलन विषय पर बनी फिल्म ‘सतलुज’, जो मूल रूप से ‘पंजाब ’95’ नाम से जानी जाती थी। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की जिंदगी और संघर्षों पर आधारित है। खालरा ने पंजाब में उग्रवाद के दौर में जबरन गायब किए गए लोगों और उनके गुप्त अंतिम संस्कारों का पर्दाफाश किया था। उनकी जांच ने न केवल पंजाब पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की जवाबदेही पर भी बहस छेड़ दी।
हनी त्रेहान निर्देशित फिल्म सतलुज में अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालरा का किरदार निभाया है। सही मायने में दिलजीत ने अपने अभिनय से किरदार को जीवंत कर दिया है। इस फिल्म की खासियत यह है कि पूरे फिल्म में कोई शोर शराबा कोई प्रेम प्रसंग नही कोई आइटम सॉन्ग नहीं उसके बावजूद यह फिल्म लोगों को बहुत प्रभावित करती है। जब जसवंत सिह अपने गुमशुदा पड़ोसी किरपाल सिहं के संबंध में पुलिस पदाधिकारी से बार बार पूछता है तो एसपी कहता है फसल में कीड़ा लग गया था इसलिए फसल काटना पड़ा। तब जसवंत सिंह बड़े गंभीर होकर जवाब देता है फसल में कीड़ा लग गया था लेकिन खेत तो किसान का था। अर्जून रामपाल ने सीबीआई अधिकारी के किरदार के साथ न्याय किया है। फिल्म सतलुज का सफर अपने आप में एक राजनीतिक कथा बन गया। पहले इसका नाम ‘घल्लूघारा’ रखा गया, जो सिख नरसंहार की ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ा था। बाद में इसे ‘पंजाब ’95’ कहा गया, और अंततः सेंसरशिप की पेचीदगियों के चलते इसका नाम बदल कर ‘सतलुज’ कर दिया गया। नाम बदलने की यह प्रक्रिया केवल औपचारिक नहीं थी, बल्कि यह इस बात का प्रतीक बन गई कि संवेदनशील इतिहास को किस तरह सार्वजनिक मंच पर पेश करने की अनुमति दी जाती है।
सेंसर बोर्ड ने फिल्म पर 127 कट्स की मांग की थी—एक असाधारण संख्या, खासकर तब जब फिल्म डॉक्यूमेंटेड घटनाओं पर आधारित थी। यह मांग केवल कलात्मक हस्तक्षेप नहीं थी, बल्कि इसने यह सवाल खड़ा किया कि लोकतंत्र में कला को कितनी स्वतंत्रता दी जा सकती है। फिल्म को थिएटर रिलीज से रोका गया, टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से हटाया गया और अंततः महज 48 घंटे में OTT प्लेटफॉर्म से भी गायब कर दिया गया। यह घटनाक्रम यह दर्शाता है कि राजनीतिक रूप से असहज कहानियों को बार-बार संस्थागत दीवारों से टकराना पड़ता है।
विडंबना यह है कि फिल्म उसी व्यक्ति की कहानी कहती है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी गुमशुदा लोगों के सच को उजागर करने में लगा दी थी, और अंततः 6 सिंतबर 1995 को जसवंत सिंह खालरा अपने घर के सामने से रहस्यमय तरीके से गायब हो जाते हैं। खालरा की तरह ही फिल्म भी 48 घंटे के भीतर ओटीटी प्लेट से गायब हो जाती है औऱ इस बारे में कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं। अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने इसे खालरा की विरासत से जोड़ते हुए कहा था कि “जो ‘सतलुज’ के साथ हुआ, वही खालरा के साथ भी हुआ था।” यह टिप्पणी फिल्म को केवल एक कलात्मक प्रोजेक्ट नहीं रहने देती, बल्कि उसे स्मृति और न्याय की लड़ाई का हिस्सा बना देती है।
‘सतलुज’ का महत्व केवल सिनेमा ही नहीं है। यह लोकतांत्रिक समाज में कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक गंभीर प्रश्न चिह्न लगाती है। क्या लोकतंत्र इतना परिपक्व है कि वह अपने अतीत के कड़वे सच को स्वीकार कर सके? या फिर वह उन सच्चाइयों को दबाने में ही अपनी ताकत दिखाता है?
इस फिल्म की यात्रा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि सेंसरशिप केवल फिल्मों को नहीं रोकती, बल्कि इतिहास और स्मृति को भी नियंत्रित करती है। ‘सतलुज’ इस बात का सबूत है कि कला जब सत्ता से टकराती है, तो वह केवल मनोरंजन नहीं रहती—वह लोकतंत्र का आईना बन जाती है।

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