मिलावट का दर्शनशास्त्र बनाम लोकतंत्र – धर्मेंद्र कुमार
पेट्रोल में एथनॉल की मिलावट को लेकर आजकल लंबी चौड़ी बहस हो रही है। दरअसल पेट्रोल में एथनॉल की ब्लेंडिंग तो बस बहाना है। असली कहानी यह है कि आज हमारी पूरी ज़िंदगी ही मिलावट की फैक्ट्री बन चुकी है। खाद्य पदार्थों में मिलावट तो अब आम बात हैं। बल्कि अब तो लोग कहते हैं कि "बिना मिलावट का सामान खाओगे तो शरीर को झटका लग जाएगा।" आज के दौर में शुद्धता तो दुर्लभ है लेकिन मिलावट की शुद्धता की 100 प्रतिशत की गारंटी है। मिलावट वह कला है जिसमें किसी चीज की शुद्धता को समाप्त करने के लिए हम उसमें कुछ ऐसा मिला देते हैं जिससे वह न तो असली रहती है, न नकली बस कामचलाऊ बन कर रह जाती है। सामान्य अर्थ में कहें तो मिलावट का मतलब है शुद्धता को समाप्त करना होता है

मिलावट का दर्शनशास्त्र बनाम लोकतंत्र – धर्मेंद्र कुमार
पेट्रोल में एथनॉल की मिलावट को लेकर आजकल लंबी चौड़ी बहस हो रही है। दरअसल पेट्रोल में एथनॉल की ब्लेंडिंग तो बस बहाना है। असली कहानी यह है कि आज हमारी पूरी ज़िंदगी ही मिलावट की फैक्ट्री बन चुकी है। खाद्य पदार्थों में मिलावट तो अब आम बात हैं। बल्कि अब तो लोग कहते हैं कि “बिना मिलावट का सामान खाओगे तो शरीर को झटका लग जाएगा।” आज के दौर में शुद्धता तो दुर्लभ है लेकिन मिलावट की शुद्धता की 100 प्रतिशत की गारंटी है। मिलावट वह कला है जिसमें किसी चीज की शुद्धता को समाप्त करने के लिए हम उसमें कुछ ऐसा मिला देते हैं जिससे वह न तो असली रहती है, न नकली बस कामचलाऊ बन कर रह जाती है। सामान्य अर्थ में कहें तो मिलावट का मतलब है शुद्धता को समाप्त करना होता है।
व्यवहार में मिलावट
मिलावट वह प्रक्रिया है जिसके ज़रिए इंसान अपनी सच्चाई, ईमानदारी और मूल्यों को थोड़ा-थोड़ा एडजस्ट करता है ताकि वह समाज में फिट हो सके। वास्तव में “मिलावट वह राष्ट्रीय चरित्र है, जिसमें शुद्धता को अपराध और मिलावट को उपलब्धि मान लिया गया है।” मिलावट अब सिर्फ़ दूध, तेल या पेट्रोल तक सीमित नहीं रही। यह हमारी मुस्कान, रिश्तों, राजनीति, मीडिया, शिक्षा और यहां तक कि सपनों तक में घुस चुकी है। मुस्कानें अब शुद्ध नहीं रहीं। सामने से “भाई साहब” कहकर गले लगने वाले पीठ पीछे “भाई साहब” की जड़ खोदेंगे। रिश्ते अब भावनाओं पर नहीं, बल्कि मुनाफे के ब्लेंडिंग रेशियो पर टिकी हैं। वहीं राजनीति में मिलावट की बात करें तो दल बदल इतना आम हो गया है कि इसे राष्ट्रीय खेल घोषित कर देना चाहिए। आज़ादी के अमृतकाल में मिलावट का राष्ट्रीयकरण हो चुका है। बिना मिलावट वाले नेताओं को जल्द ही “राष्ट्रद्रोही” करार देने के लिए कानून लाने की तैयारी चल रही है।
जहां तक शिक्षा में मिलावट की बात है तो पढ़ाई में मेहनत की जगह अब “पेपर लीक” ने ले ली है। अब डिग्री का मतलब ज्ञान नहीं, बल्कि फर्जी सर्टिफिकेट प्राप्त कर लेना है।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया में मिलावट की बात ही निराली है। मीडिया भी अब स्पॉन्सर्ड ब्लेंडिंग मशीन बन गया है। खबरें अब तथ्यों से नहीं, विज्ञापनों से तय होती हैं।
बहसें मुद्दों पर नहीं, टीआरपी के लिए होती हैं। मीडिया अब सवाल सरकार से कम विपक्ष से ज्यादा पूछता है। जनता को मिलावटी खबरें परोसी जाती हैं—थोड़ा डर, थोड़ा सनसनी, और थोड़ा “ब्रेकिंग” का तड़का।
अब तो धर्म औऱ आस्था की शुद्धता में भी धर्म के तथाकथित ठेकेदारों ने सेंधमारी कर दी है। अब चढ़ावे की चोरी भक्तों की आस्था का सवाल नहीं रहा बल्कि यह विमर्श का विषय बन गया है कि जिसने मंदिर बनवाई उनकी निष्ठा पर शक करना ही धर्मविरोधी कार्य है।
असल में, मिलावट अब हमारी पहचान बन गई है। शुद्धता इतनी दुर्लभ है कि अगर कहीं मिल जाए तो लोग शक करने लगते हैं—”इतना शुद्ध कैसे? ज़रूर कोई चाल है!” पेट्रोल ब्लेंडिंग तो बस एक बहाना है। असली कहानी यह है कि हम सब मिलावट के महाकाव्य के पात्र बन चुके हैं। सरकारें, समाज, रिश्ते, शिक्षा, मीडिया, करियर—सब जगह मिलावट का तड़का है। सवाल यही है कि क्या हम मिलावट के बिना जीने की हिम्मत रखते हैं, या मिलावट ही हमारी नई राष्ट्रीय संस्कृति बन चुकी है?



