रामद्रोहियों पर क्यों खामोश है संघ ?- धर्मेंद्र कुमार
अयोध्या रामलला मंदिर में चढ़ावे की चोरी ने न केवल भक्तों की आस्था को झकझोरा है, बल्कि मंदिर प्रबंधन और उससे जुड़े संगठनों की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राम मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। जब चढ़ावे की चोरी होती है और प्रबंधन पर सवाल उठते हैं, तो यह सीधे-सीधे भक्तों की भावनाओं पर हमला है। संघ और सरकार की चुप्पी इस हमले को और गहरा करती है। आस्था की रक्षा केवल नारों से नहीं, बल्कि पारदर्शी व्यवस्था से होती है।इस पूरे मामले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की रहस्यमयी चुप्पी का राज क्या है ? यह देश का प्रत्येक हिंदू जानना चाहता है। जबकि मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय बंसल सहित ज्यादातर सदस्य संघ से जुड़े हुए बताए जाते हैं। ऐसे में संगठन का मौन व्रत धारण

रामद्रोहियों पर क्यों खामोश है संघ ?- धर्मेंद्र कुमार
अयोध्या रामलला मंदिर में चढ़ावे की चोरी ने न केवल भक्तों की आस्था को झकझोरा है, बल्कि मंदिर प्रबंधन और उससे जुड़े संगठनों की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राम मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। जब चढ़ावे की चोरी होती है और प्रबंधन पर सवाल उठते हैं, तो यह सीधे-सीधे भक्तों की भावनाओं पर हमला है। संघ और सरकार की चुप्पी इस हमले को और गहरा करती है। आस्था की रक्षा केवल नारों से नहीं, बल्कि पारदर्शी व्यवस्था से होती है।इस पूरे मामले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की रहस्यमयी चुप्पी का राज क्या है ? यह देश का प्रत्येक हिंदू जानना चाहता है। जबकि मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय बंसल सहित ज्यादातर सदस्य संघ से जुड़े हुए बताए जाते हैं। ऐसे में संगठन का मौन व्रत धारण करना यह इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं ट्रस्ट के सदस्यों को संरक्षण का कवच उपलब्ध कराया जा रहा है।
चोरी पर चुप क्यों संघ ?
संघ ने हमेशा स्वयं को “संस्कृति और राष्ट्रवाद का प्रहरी” बताया है। लेकिन जब उसके ही लोगों पर आरोप लगते हैं और संगठन मौन रहता है, तो यह उसकी वैचारिक जिम्मेदारी पर प्रश्नचिह्न है। क्या राष्ट्रवाद केवल भाषणों तक सीमित है, और जब आस्था पर डाका पड़ता है तो संगठन की भूमिका समाप्त हो जाती है?
राम मंदिर में हुई चढ़ावे की चोरी में ट्रस्ट से जुड़े लोगों पर सीधे सवाल उठने के बावजूद संघ ने न तो निंदा की और न ही कोई जवाबदेही तय की। इससे ऐसा प्रतित होता है कि छोटे कर्मचारियों पर चोरी व गबन का ठीकरा फोड़कर बड़े पदाधिकारियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। यह वही रणनीति है जिसमें “बलि का बकरा” खोजकर असली जिम्मेदारों को ढाल प्रदान की जाती है।
सरकार की भूमिका
सरकार की ओर से भी इस मामले में वही रुख अपनाया गया है छोटे स्तर पर कार्रवाई, बड़े स्तर पर मौन। यह मौन केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों का हिस्सा प्रतीत होता है। मंदिर ट्रस्ट में संघ से जुड़े लोगों की मौजूदगी को देखते हुए यह मानना कठिन नहीं कि सरकार और संगठन दोनों मिलकर उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
पारदर्शिता का अभाव
राम मंदिर में प्रारंभ से ही पारदर्शिता का अभाव रहा हैं। जिसको लेकर सवाल उठते रहा है। लेक्न सरकार की ओर इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई करने के बजाय लीपापोती कर मामले को दबाने काही प्रयास किया गया। जमीन घोटाला में अब तक की कार्रवाई नहीं किए जाने से सवाल तो खड़े होंगे ही ना। मंदिर में आने वाले करोड़ों रुपये के चढ़ावे का कोई स्पष्ट ऑडिट नहीं होता। आधुनिक तकनीक (सीसीटीवी, सेंसर, अलार्म) का अभाव यह दर्शाता है कि सुरक्षा को जानबूझकर कमजोर रखा गया। भक्तों को चढ़ावे की रसीद नहीं देना साथ ही मंदिर प्रबंधन द्वारा यह जानकारी नहीं करना कि उनके चढ़ावे का उपयोग कैसे हो रहा है।
अयोध्या प्रकरण केवल चोरी का मामला नहीं, बल्कि संरक्षण, मिलीभगत और पारदर्शिता की कमी का प्रतीक है। संघ की चुप्पी और सरकार का मौन यह दर्शाता है कि संगठन अपने लोगों को बचाने के लिए आस्था की कीमत पर समझौता कर रहा है। यदि आस्था की रक्षा करनी है, तो सबसे पहले प्रबंधन को जवाबदेह बनाना होगा और संघ को यह दिखाना होगा कि वह केवल विचारधारा का नहीं, बल्कि ईमानदारी का भी प्रहरी है।


