देश के युवाओं ने भरी हुंकारः बरसीं लाठियां और पानी की बौछार -धर्मेंद्र कुमार
देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर 20 जुलाई को जो दृश्य दिखाई दिया, उसने भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है। मॉनसून सत्र के पहले ही दिन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के 'संसद चलो' आहवान पर देश भर से आए हजारों युवाओं का सैलाब जब जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ा, तो उनके स्वागत में संवाद के रास्ते नहीं, बल्कि लाठियां, आंसू गैस के गोले और पानी की बौछारें तैयार खड़ी थीं। पेपर लीक और चरमराती शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ अपनी जायज आवाज बुलंद कर रहे इन निहत्थे छात्रों पर पुलिसिया बल प्रयोग ने व्यवस्था के उस चेहरे को बेनकाब कर दिया है, जो युवाओं के सपनों को सुरक्षा देने के बजाय उनकी आवाज को कुचलने में अधिक तत्पर नजर आता है। युवा आक्रोश और व्यवस्था का बहरापन

देश के युवाओं ने भरी हुंकारः बरसीं लाठियां और पानी की बौछार -धर्मेंद्र कुमार
देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर 20 जुलाई को जो दृश्य दिखाई दिया, उसने भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है। मॉनसून सत्र के पहले ही दिन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘संसद चलो’ आहवान पर देश भर से आए हजारों युवाओं का सैलाब जब जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ा, तो उनके स्वागत में संवाद के रास्ते नहीं, बल्कि लाठियां, आंसू गैस के गोले और पानी की बौछारें तैयार खड़ी थीं। पेपर लीक और चरमराती शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ अपनी जायज आवाज बुलंद कर रहे इन निहत्थे छात्रों पर पुलिसिया बल प्रयोग ने व्यवस्था के उस चेहरे को बेनकाब कर दिया है, जो युवाओं के सपनों को सुरक्षा देने के बजाय उनकी आवाज को कुचलने में अधिक तत्पर नजर आता है।
युवा आक्रोश और व्यवस्था का बहरापन
देश का युवा आज केवल रोजगार नहीं, बल्कि परीक्षाओं की शुचिता मांग रहा है। नीट (NEET) जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं के बार-बार लीक होते पर्चे, युवाओं के वर्षों की तपस्या को मटियामेट कर रहे हैं। अपने भविष्य को बचाने के लिए शांतिपूर्ण ढंग से मार्च निकाल रहे छात्रों पर सरकार द्वारा बर्बर लाठीचार्ज और वॉटर कैनन का इस्तेमाल यह दर्शाता है कि सत्ता अब आलोचना सुनने का धैर्य खो चुकी है। आंदोलनकारी छात्र शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और एक पारदर्शी परीक्षा प्रणाली की ही तो मांग कर रहे हैं, लेकिन शासन का रवैया उदासीन और दमनकारी बना हुआ है।
सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि संसद का रास्ता हमेशा सड़कों से होकर ही गुजरता है। जब संसद के भीतर जनसरोकारों से जुड़े मुद्दे और युवाओं की भविष्य की चिंताएं राजनीतिक शोर-शराबे में दब जाती हैं, तब जंतर-मंतर जैसी जगहें लोकतंत्र के गर्भगृह में बदल जाती हैं। हाथों में तिरंगा लिए, अपनी पीठ पर भारी बैग टांगे ये युवा किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि अपनी भविष्य एवं योग्यता की रक्षा के लिए दिल्ली आए थे। सोनम वांगचुक जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं का अनशन और युवाओं की यह स्वतःस्फूर्त भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि पानी अब सिर से ऊपर जा चुका है।
दिल्ली पुलिस ने इस प्रदर्शन को अवैध और हिंसक बताकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की है, लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल लहूलुहान छात्रों के वीडियो और उनकी बेबसी कुछ और ही कहानी बयां करती है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में युवाओं की पीठ पर लाठियां भांजकर राष्ट्र निर्माण की कल्पना नहीं की जा सकती। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पुलिसिया लाठीचार्ज में घायल हुए 103 छात्रों का इलाज विभिन्न अस्पतालों में चल रहा है।
सरकार को यह समझना होगा कि इस ‘जेन-जी’ (Gen Z) पीढ़ी को डराकर या इंटरनेट बंद करके उनकी आवाज को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता।समय की मांग है कि सत्ता अहंकार का त्याग कर प्रदर्शनकारी छात्रों से सीधी बात करे। परीक्षाओं में ढांचागत सुधार लाना और दोषियों पर सख्त कार्रवाई करना ही इस असंतोष का एकमात्र समाधान है। यदि आज देश के सबसे मेधावी छात्र न्याय की भीख मांगते हुए सड़कों पर पीटे जाएंगे, तो देश का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। संसद को तत्काल इस विषय पर गंभीर बहस करनी चाहिए, क्योंकि युवाओं की यह हुंकार कोई सामान्य विरोध नहीं, बल्कि देश के भविष्य को बचाने की एक आखिरी पुकार है।

