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म्यांमार में मानवीय त्रासदी गहराई, लाखों नागरिक अपने ही देश में बने शरणार्थी-नव ठाकुरीया

जब पूरी दुनिया 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस मना रही थी, उसी समय म्यांमार (बर्मा अथवा ब्रह्मदेश) से एक ऐसी त्रासद तस्वीर सामने आई, जिसने वहाँ के गहराते मानवीय संकट को फिर उजागर कर दिया। राजधानी नेपीता में सेना के नियंत्रण वाली सरकार पर अपने ही नागरिकों को विस्थापित और शरणार्थी बनने के लिए मजबूर करने के आरोप लग रहे हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अनुसार, 53 लाख से अधिक म्यांमारवासी इस समय अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन-यापन कर रहे हैं

म्यांमार में मानवीय त्रासदी गहराई, लाखों नागरिक अपने ही देश में बने शरणार्थी-नव ठाकुरीया

जब पूरी दुनिया 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस मना रही थी, उसी समय म्यांमार (बर्मा अथवा ब्रह्मदेश) से एक ऐसी त्रासद तस्वीर सामने आई, जिसने वहाँ के गहराते मानवीय संकट को फिर उजागर कर दिया। राजधानी नेपीता में सेना के नियंत्रण वाली सरकार पर अपने ही नागरिकों को विस्थापित और शरणार्थी बनने के लिए मजबूर करने के आरोप लग रहे हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अनुसार, 53 लाख से अधिक म्यांमारवासी इस समय अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन-यापन कर रहे हैं।
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) ने बताया कि 10 लाख से अधिक लोग बांग्लादेश, थाईलैंड और भारत (खासकर पूर्वोत्तर के मणिपुर और मिज़ोरम राज्य) जैसे पड़ोसी देशों में शरण ले चुके हैं। वहीं, लगभग 37 लाख लोग अपने ही देश में विस्थापित होकर सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने को विवश हैं, जहाँ उन्हें भोजन, स्वास्थ्य सेवाओं और सुरक्षित आवास जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं। लगभग 5.5 करोड़ की आबादी वाले म्यांमार में करीब 80 प्रतिशत लोग लंबे समय से गरीबी से जूझ रहे हैं। ऐसे में, नाममात्र की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बावजूद अपने ही नागरिकों के विरुद्ध चलाए जा रहे सैन्य अभियान ने स्थिति को और भयावह बना दिया है।
1 फरवरी 2021 को हुए सैन्य तख्तापलट के बाद से हालात लगातार बिगड़ते गए। उस समय आंग सान सू ची के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार को तत्कालीन सेना प्रमुख मिन आंग ह्लाइंग ने अपदस्थ कर दिया था। विवादित राष्ट्रीय चुनावों के बाद ह्लाइंग अब राष्ट्रपति के रूप में सत्ता में हैं।
सैन्य बलों द्वारा लगातार किए जा रहे हवाई हमलों, गाँवों को जलाने और आम नागरिकों को निशाना बनाने की घटनाओं के कारण सैकड़ों गाँव खाली हो चुके हैं और हजारों परिवारों को पलायन करना पड़ा है। हालाँकि, ह्लाइंग अब शांति की बातें कर रहे हैं और म्यांमार के नागरिक प्रमुख के रूप में भारत तथा चीन की उनकी हालिया आधिकारिक यात्राओं से उन्हें कुछ हद तक अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता भी मिली है। रणनीतिक और आर्थिक हितों के कारण ‘गोल्डन पैगोडा की भूमि’ कहे जाने वाले म्यांमार में दोनों पड़ोसी देशों ने उनका औपचारिक स्वागत किया, लेकिन सैन्य शासन के अधीन जमीनी हालात अब भी गंभीर बने हुए हैं।
वर्तमान में म्यांमार सरकार का देश के केवल 30 प्रतिशत भूभाग पर ही नियंत्रण है, जबकि जातीय विद्रोही संगठन और पीपुल्स डिफेंस फोर्सेस (PDF) लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्रों में अपना प्रशासन चला रहे हैं। शेष इलाकों में लगातार सशस्त्र संघर्ष जारी है। दो वर्ष से अधिक समय पहले सैन्य शासन के विरोधी समूहों ने संयुक्त अभियान शुरू किया था, जिसके बाद देश गहरे राजनीतिक, आर्थिक और मानवीय संकट में फँस गया। अराकान आर्मी (AA) नामक शक्तिशाली विद्रोही संगठन वर्तमान में रखाइन राज्य के लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर चुका है और वहाँ अपना प्रशासन चला रहा है। एए के लड़ाके राज्य की राजधानी सितवे पर कब्ज़ा करने के उद्देश्य से जुंटा बलों के विरुद्ध अभियान जारी रखे हुए हैं।
संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुमान के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में इस संघर्ष में 75 हजार से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। रखाइन और मध्य म्यांमार आज भी सेना की कार्रवाई से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र बने हुए हैं। UN के मानवाधिकार उच्चायुक्त ने हाल ही में कहा कि इन दोनों क्षेत्रों में आम नागरिकों के विरुद्ध हिंसा और क्रूरता में और वृद्धि हुई है। लोकतंत्र समर्थक सशस्त्र समूहों से युद्ध के मैदान में लगातार चुनौतियाँ मिलने के बाद जुंटा सेना अक्सर नागरिक क्षेत्रों पर लड़ाकू विमानों, ड्रोन और पैरा-मोटर के माध्यम से विस्फोटक गिराती है तथा स्कूलों, अस्पतालों और शरणार्थी शिविरों तक को निशाना बनाती है।
गृहयुद्ध और आर्थिक संकट का सबसे अधिक असर बच्चों और युवाओं पर पड़ा है। अनुमान है कि 2026-27 के शैक्षणिक सत्र में 60 लाख से अधिक बच्चे और युवा विद्यालय नहीं जा सकेंगे। इस प्रकार देश के लगभग 1.3 करोड़ स्कूली बच्चों में से लगभग आधे औपचारिक शिक्षा से वंचित हो चुके हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था भी गंभीर संकट से गुजर रही है। क्लीनिकों पर बार-बार हुए हवाई हमलों में अनेक चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी मारे गए हैं, जबकि प्रशासन ने कई महत्वपूर्ण निजी अस्पतालों को भी बंद कर दिया है।
मीडिया जगत भी स्वतंत्रता के बाद के सबसे कठिन दौर का सामना कर रहा है। हजारों राजनीतिक बंदियों के साथ-साथ पिछले पाँच वर्षों में 215 मीडियाकर्मियों को निशाना बनाया गया है। जिनेवा स्थित वैश्विक मीडिया सुरक्षा एवं अधिकार संस्था प्रेस एम्बलम कैंपेन (PEC) के अनुसार लगभग 15 पत्रकार अब भी हिरासत में हैं। संस्था ने यह भी खुलासा किया है कि 97 मीडिया संस्थानों को कानूनी उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। सैन्य तख्तापलट के बाद आंग सान सू ची की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) के निर्वाचित सांसदों द्वारा गठित नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (NUG) ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से पारदर्शिता, जवाबदेही और स्थानीय समुदायों के अधिकारों का सम्मान सुनिश्चित करने की अपील की है।
समानांतर नागरिक प्रशासन के रूप में कार्यरत एनयूजी का कहना है कि तख्तापलट के नेता मिन आंग ह्लाइंग के नियंत्रण वाली जुंटा सरकार के साथ किए गए किसी भी आर्थिक अथवा निवेश समझौते की वैधता संदिग्ध है और ऐसे समझौतों में कानूनी, वित्तीय तथा परिचालन संबंधी गंभीर जोखिम भी निहित हैं। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि म्यांमार में सामान्य स्थिति बहाल होने में अभी काफी समय लग सकता है। राजनीतिक अस्थिरता, सशस्त्र संघर्ष, आर्थिक संकट और मानवीय त्रासदी ने देश को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ लाखों नागरिक आज भी अपने ही देश में सुरक्षा, सम्मान और सामान्य जीवन की तलाश में संघर्ष कर रहे हैं।

लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक

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