Gen-Z देश की ताकत है, दुश्मन नहीं दमन से नहीं, अवसरों से संवरेगा युवा भविष्य- धर्मेंद्र कुमार
डिजिटल क्रांति के इस युग में भारत दुनिया का सबसे युवा देश होने का गौरव रखता है। वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मी इस 'जेन-जी' (Gen-Z) पीढ़ी को आज देश की सबसे बड़ी ताकत और रीढ़ माना जाना चाहिए। यदि सरकार इस पीढ़ी की असीम तकनीकी दक्षता की क्षमता का सही दिशा में इस्तेमाल करे, तो निश्चित रूप से भारत वैश्विक स्तर पर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अग्रणी बनने की क्षमता रखता है। लेकिन विडंबना यह है कि सरकार इस ऊर्जावान पीढ़ी की भावनाओं, उनकी चिंताओं और उनके आक्रोश को समझने के बजाय, उन्हें अपना विरोधी या शत्रु मान बैठी है

Gen-Z देश की ताकत है, दुश्मन नहीं दमन से नहीं, अवसरों से संवरेगा युवा भविष्य- धर्मेंद्र कुमार
डिजिटल क्रांति के इस युग में भारत दुनिया का सबसे युवा देश होने का गौरव रखता है। वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मी इस ‘जेन-जी’ (Gen-Z) पीढ़ी को आज देश की सबसे बड़ी ताकत और रीढ़ माना जाना चाहिए। यदि सरकार इस पीढ़ी की असीम तकनीकी दक्षता की क्षमता का सही दिशा में इस्तेमाल करे, तो निश्चित रूप से भारत वैश्विक स्तर पर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अग्रणी बनने की क्षमता रखता है। लेकिन विडंबना यह है कि सरकार इस ऊर्जावान पीढ़ी की भावनाओं, उनकी चिंताओं और उनके आक्रोश को समझने के बजाय, उन्हें अपना विरोधी या शत्रु मान बैठी है
दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले दिनों पेपर लीक को लेकर हुए आंदोलन के समाप्त होने के बाद जो परिदृश्य उभरकर सामने आया है, वह अत्यंत चिंताजनक और लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
युवाओं को डराने का प्रयास हाल के दिनों में आंदोलन में शामिल रहे युवाओं को रणनीतिक रूप से टारगेट किया जा रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी खबरें आ रही हैं जहां आंदोलनकारी युवाओं और उनके परिवारों को डराया-धमकाया जा रहा है। संसद में अमर्यादित भाषा बोलने वाले सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अपनी बात मुखरता से रखने वाली इस पीढ़ी की भाषा, पहनावे और व्यवहार पर सवाल उठाकर उन्हें मुख्यधारा से काटने की कोशिश की जा रही है। यहां सत्ता का दोहरा चरित्र साफ उजागर होता है। एक तरफ जहां सरकार के नीति-निर्माता और प्रवक्ता मंचों से युवाओं के प्रति संवेदनशीलता, डिजिटल इंडिया और युवा शक्ति के कल्याण की बड़ी-बड़ी बातें करते दिख रहे हैं। वहीं दूसरी ओर जमीन पर हकीकत बिल्कुल ठीक इसके उलट है। हक की आवाज उठाने वाले इन बच्चों को पुलिस तंत्र द्वारा डराया जा रहा है और अनावश्यक रूप से पुलिस थानों में डिटेन किया जा रहा है। बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिसिया धौंस और प्रशासनिक दमन से Gen-Z की मुखर आवाज को दबाया जा सकता है? इतिहास गवाह है कि युवा चेतना को जितना दबाया जाता है, उसका विस्फोट उतना ही तीव्र होता है।
पेपर लीक और आंदोलनों का अंतहीन सिलसिला बीते कुछ समय में देश ने राष्ट्रीय स्तर पर NEET-UG, UGC-NET और विभिन्न राज्य स्तरीय पुलिस व शिक्षक भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक और प्रशासनिक अनियमितताओं का एक लंबा दौर देखा है। इन घटनाओं ने देश के करोड़ों युवाओं को मानसिक अवसाद और अनिश्चितता के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। जब अपनी बरसों की मेहनत को चंद रुपयों में बिकते देख छात्र सड़कों पर शांतिपूर्ण न्याय मांगने उतरते हैं, तो उन्हें ‘अराजक तत्व’ कहकर संबोधित किया जाता है। दिल्ली के उत्तर प्रदेश भवन या जंतर-मंतर जैसे संवेदनशील इलाकों में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर जिस तरह पुलिसिया बल का प्रयोग किया गया, उसने इस लोकतांत्रिक देश में युवाओं के संवैधानिक अधिकारों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
बेरोजगारी के आंकड़े और अवसरों की भारी कमी
आज देश के युवाओं के सामने सबसे बड़ा संकट केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की विफलता नहीं, बल्कि बाजार में ‘अवसरों की भारी कमी’ है। ‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ और श्रम बल सर्वेक्षणों के आंकड़े बता रहे हैं कि भारत में शिक्षित युवाओं (विशेषकर 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग) के बीच बेरोजगारी की दर चिंताजनक है। देश के उच्च शिक्षण संस्थानों से डिग्री हाथ में लेकर निकलने वाला युवा सम्मानजनक रोजगार की तलाश में दर-दर भटकने को मजबूर है। जब बुनियादी बाजार में रोजगार के पर्याप्त अवसर ही उपलब्ध नहीं हैं, ऐसे में यदि Gen-Z अपने भविष्य, करियर और आर्थिक सुरक्षा को लेकर चिंतित है और सड़कों पर उतरकर सवाल पूछ रहा है, तो इसमें गलत क्या है?
‘डिजिटल इंडिया’ की कागजी दावे बनाम जमीनी हकीकत
एक तरफ सरकार ‘स्किल इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’, ‘मुद्रा लोन’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी भारी-भरकम योजनाओं का जोर-शोर से प्रचार करती है। दावा किया जाता है कि ये योजनाएं युवाओं को नौकरी मांगने वाले के बजाय नौकरी देने वाला बनाएंगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन योजनाओं का लाभ लालफीताशाही, जटिल लोन प्रक्रियाओं और गाइडलाइंस के अभाव के कारण जमीनी स्तर पर अंतिम पायदान पर खड़े युवा तक नहीं पहुंच पा रहा है। डिजिटल और तकनीकी रूप से सबसे सक्षम होने के बावजूद, भारतीय Gen-Z को अपनी स्टार्टअप और इनोवेशन प्रतिभा को निखारने के लिए सही संसाधन और सरकारी सहयोग नहीं मिल पा रहा है।
वर्तमान सरकार को यह समझना होगा कि देश का विकास केवल सोशल मीडिया पर ‘रील्स’ बनाने, चमकीले विज्ञापनों और डिजिटल पीआर स्टंट से नहीं होगा। युवाओं को ‘रियल’ (वास्तविक) धरातल पर ठोस रोजगार, सुरक्षित परीक्षा प्रणाली और भयमुक्त वातावरण की जरूरत है। खोखले दावों से युवाओं का भविष्य नहीं संवारा जा सकता।
सरकार को यह भ्रम छोड़ देना चाहिए कि यह पीढ़ी केवल रील देखने और बनाने में व्यस्त है। यह पीढ़ी जितनी तकनीकी रूप से सजग है, उतनी ही राजनीतिक और सामाजिक रूप से जागरूक भी है। यदि सरकार समय रहते युवाओं की जायज मांगों, उनकी भावनाओं और उनके रोजगार के संकट को नहीं समझती है, तो युवाओं का यह असंतोष भविष्य में सत्तासीन सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक नुकसान का सबब बन सकता है। इसलिए सरकार को दमन और डराने की नीति को तुरंत छोड़कर, युवाओं के साथ एक पारदर्शी संवाद स्थापित करना चाहिए और देश के निर्माण में उनकी ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग करना चाहिए।


