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जमशेदपुर में पुलिस का इक़बाल खत्म, बेख़ौफ़ हुए अपराधी -धर्मेंद्र कुमार

जमशेदपुर जिसे कभी औद्योगिक नगरी के रूप में जाना जाता था आज अपराधियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बनता जा रहा है। स्टील सिटी, क्लीन सिटी और ग्रीन सिटी के रुप में प्रसिद्ध जमशेदपुर शहर की हालात ऐसे हो गए हैं कि पुलिस का इक़बाल कमजोर पड़ता दिख रहा है और अपराधी बेख़ौफ़ होकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। जिस प्रकार पिछले दिनों बिष्टुपुर में पुलिस की मौजूदगी में अपराधियों ने हिमांशु सिंह और साथी पर चाकू औऱ चापड़ से हमला कर गंभीर रुप से घायल कर दिया

जमशेदपुर में पुलिस का इक़बाल खत्म, बेख़ौफ़ हुए अपराधी
-धर्मेंद्र कुमार

जमशेदपुर- जमशेदपुर जिसे कभी औद्योगिक नगरी के रूप में जाना जाता था आज अपराधियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बनता जा रहा है। स्टील सिटी, क्लीन सिटी और ग्रीन सिटी के रुप में प्रसिद्ध जमशेदपुर शहर की हालात ऐसे हो गए हैं कि पुलिस का इक़बाल कमजोर पड़ता दिख रहा है और अपराधी बेख़ौफ़ होकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। जिस प्रकार पिछले दिनों बिष्टुपुर में पुलिस की मौजूदगी में अपराधियों ने हिमांशु सिंह और साथी पर चाकू औऱ चापड़ से हमला कर गंभीर रुप से घायल कर दिया। और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। इससे यह स्पष्ट हो गया कि पुलिस का इकबाल खत्म हो गया है और अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। आज अपराधियों में पुलिस औऱ न्याय व्यवस्था का खौफ बिलकुल खत्म हो गया है। अपराधियों को पता है कि छह महीने में उनको जमानत मिल जाएगी और वो जेल से बाहर निकल जाएंगे।

कानून-व्यवस्था की गिरती साख

पुलिस का इक़बाल केवल वर्दी की ताक़त से नहीं बल्कि जनता के विश्वास से बनता है। कानून व्यव्स्था का राज स्थापित करने की जिम्मेवारी भी पुलिस प्रशासन की है। 90 के दशक में जब शहर में अपराध चरम पर था, इसी तरह पुलिस का इकबाल खत्म हो गया था। तब शहर के नए पुलिस कप्तान के तौर पर कमान संभालने के बाद डॉ. अजय कुमार ने अपने कार्यशैली से ना केवल अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की बल्कि अपराधियों को शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया। कानून व्यवस्था का राज स्थापित किया और शहरवासियों का भरोसा जीता। आम नागरिकों के शिकायत पर तब त्वरित कार्रवाई होती थी। आज के माहौल में एक बार फिर डॉ. अजय कुमार की जरुरत महसूस हो रही हैं। आज के समय में आम नागरिक यह महसूस करने लगे कि शिकायत दर्ज कराने से भी कोई कार्रवाई नहीं होगी, तब अपराधियों का मनोबल स्वतः बढ़ जाता है। यही स्थिति आज जमशेदपुर में दिखाई दे रही है। चोरी, लूट, हत्या और नशे का कारोबार खुलेआम हो रहा है, लेकिन पुलिस की मौजूदगी केवल कागज़ों में दर्ज है। पुलिस केवल चौक चौराहों पर हेलमेट चेक करने और फाइन वसूलने में व्यस्त है। आम नागरिकों के साथ पुलिस का व्यवहार अपराधियों सा रहता है। वहीं अपराधी दिनदहाड़े घटना को अंजान दे रहे हैं।

प्रशासनिक उदासीनता

कानून-व्यवस्था बिगड़ने का सबसे बड़ा कारण प्रशासनिक उदासीनता है। अपराधियों पर कार्रवाई करने के बजाय अक्सर देखा जाता है कि पुलिस छोटे-मोटे मामलों में उलझी रहती है। बड़े अपराधी राजनीतिक संरक्षण पाकर बच निकलते हैं। नतीजा यह होता है कि जनता का भरोसा टूटता है और अपराधियों का हौसला बढ़ता है। वहीं जब अपराधियों का मनोबल बढ़ता है तो समाज में भय का वातावरण बनता है। आज व्यापारी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, छात्र-छात्राएं भयभीत रहते हैं और आम नागरिक अपने ही शहर में असुरक्षा का अनुभव कर रहे हैं। यह स्थिति लोकतंत्र और विकास दोनों के लिए घातक है।

समाधान की राह

कानून व्यवस्था के बेहतर संधारण के लिए यह बहुत जरुरी है कि अपराधियों को उनके ही भाषा में पुलिस द्वारा जवाबी कार्रवाई की जाए ताकि अपराधियों में पुलिस का खौफ पैदा हो। अच्छी पुलिसिंग के लिए जरुरी है, ज्यादा से ज्यादा आधुनिक तकनीक का प्रयोग, नियमित रुप प्रशिक्षण और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। वहीं अपराधियों को संरक्षण देने वाली राजनीति पर अंकुश लगाना होगा। नागरिकों को भी अपराध के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी और पुलिस को सहयोग देना होगा। अपराधियों को शीघ्र सज़ा मिले ताकि समाज में भय और कानून का सम्मान कायम हो।

जमशेदपुर में पुलिस का इक़बाल बहाल करना केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं बल्कि सामाजिक आवश्यकता भी है। यदि पुलिस और प्रशासन समय रहते कठोर कदम नहीं उठाती है, तो यह औद्योगिक नगरी अपराधियों की राजधानी बन सकती है। लोकतंत्र की असली ताक़त जनता का विश्वास है, और वह तभी लौटेगा जब पुलिस अपराधियों पर शिकंजा कसने में सफल होगी।

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