जमशेदपुर बंद का आहवान मुद्दा विहीन विपक्ष, लकीर पीटने को मजबूर ?- धर्मेंद्र कुमार
झारखंड की राजनीति इन दिनों एक विचित्र मोड़ पर खड़ी है। विपक्ष के पास ठोस मुद्दों का अभाव है, लेकिन अपनी राजनीतिक पहचान बचाने के लिए वह हर घटना को "राजनीतिक ऑक्सीजन" में बदलने को मजबूर है। हिमांशु हत्याकांड इसी का ताज़ा उदाहरण है। भाजपा ने इस घटना को आधार बनाकर जमशेदपुर बंद का आहवान किया, मानो जनता के आक्रोश को अपने समर्थन में बदलना ही उनका अंतिम सहारा हो। वहीं वर्षों बाद शहर बंद के आहवान का व्यापारियों ने भी इसका समर्थन किया, जिसके कारण यह बंद पूरी तरह सफल रहा

जमशेदपुर बंद का आहवान मुद्दा विहीन विपक्ष, लकीर पीटने को मजबूर ?- धर्मेंद्र कुमार
जमशेदपुर- झारखंड की राजनीति इन दिनों एक विचित्र मोड़ पर खड़ी है। विपक्ष के पास ठोस मुद्दों का अभाव है, लेकिन अपनी राजनीतिक पहचान बचाने के लिए वह हर घटना को “राजनीतिक ऑक्सीजन” में बदलने को मजबूर है। हिमांशु हत्याकांड इसी का ताज़ा उदाहरण है। भाजपा ने इस घटना को आधार बनाकर जमशेदपुर बंद का आहवान किया, मानो जनता के आक्रोश को अपने समर्थन में बदलना ही उनका अंतिम सहारा हो। वहीं वर्षों बाद शहर बंद के आहवान का व्यापारियों ने भी इसका समर्थन किया, जिसके कारण यह बंद पूरी तरह सफल रहा।
विपक्ष की रणनीति
भाजपा और अन्य विपक्षी दलों के पास इस समय कोई ठोस जनहित का एजेंडा नहीं है। ऐसे में वे हर संवेदनशील घटना को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बंद का आह्वान जनता के गुस्से को राजनीतिक समर्थन में बदलने का प्रयास है। यह रणनीति विपक्ष की मजबूरी को उजागर करती है। मुद्दों के अभाव में वे “लकीर पीटने” को विवश हैं। जमशेदपुर में यह कोई पहली घटना नहीं है। विपक्ष को चाहिए कि वह इस मुद्दा को विधानसभा पटल पर जोरदार तरीके से उठाए और सरकार को पूरे प्रदेश में बेहतर कानून व्यवस्था बहाल करने पर मजबूर कर दे। जनता के मन में कानून व्यवस्था के प्रति भरोसा कायम करना सरकार के साथ ही विपक्ष की भी जिम्मेवारी होती है। केवल शहर बंद के आह्वान से इस प्रकार की आपराधिक घटनाओं पर विराम नहीं लग सकता है।
सरकार की प्रतिक्रिया
सरकार ने घटना की गंभीरता को देखते हुए वरीय पुलिस अधीक्षक को तत्काल प्रभाव से हटा दिया एवं नए एसएसपी डॉ. एहतेशाम वकारिब को पदास्थापित किया। वहीं डीआईजी कोल्हान को पूरी घटना की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई जबकि एडीजी को शहर भेजकर पूरे मामले की समीक्षा और ठोस कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया। वहीं सरकार की ओर से पीड़ित परिवार को हरसंभव सहयोग करने का आश्वासन दिया गया है। सरकार की ओर से उठाए गए यह कदम प्रशासनिक तत्परता दिखाने का प्रयास है, लेकिन जनता के मन में सवाल वही है। क्या यह केवल “तत्कालिक दबाव” का परिणाम है या कानून-व्यवस्था सुधारने की गंभीर कोशिश। सरकार के समक्ष चुनौती यह है कि वह केवल “फायर फाइटिंग” न करे, बल्कि दीर्घकालिक सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए। पुलिस को राजस्व वसूली के टूल के तौर पर इस्तेमाल करना बंद करें और पुलिस से कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने का स्पष्ट निर्देश दें तभी शहर में शांति बहाल हो पाएगी।
जनता की स्थिति
जनता का आक्रोश वास्तविक है। लगातार शहर में हो रही आपराधिक घटनाओं ने लोगों का सुरक्षा और न्याय पर से भरोसे को समाप्त दिया है। बंद से आम नागरिकों को असुविधा होती है, लेकिन वे भी चाहते हैं कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो। लोगों की अपेक्षा है कि यह मामला केवल राजनीतिक नारेबाज़ी तक सीमित न रहे, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंचे। जनता अब केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि ठोस परिणाम चाहती है। जमशेदपुर बंद यह स्पष्ट करता है कि झारखंड की राजनीति में विपक्ष मुद्दों की तलाश में है और सरकार दबाव में त्वरित कदम उठा रही है। असली चुनौती यह है कि क्या इस घटना को केवल राजनीतिक अवसर के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा या फिर इसे न्याय और कानून-व्यवस्था सुधारने का अवसर बनाया जाएगा।



