झारखंड में गठबंधन की मजबूरी और कांग्रेस की चुनौती – धर्मेंद्र कुमार
झारखंड की राजनीति इस समय दिल मिले ना मिले, हाथ मिलाते रहिए कहावत जैसी हो गई है। प्रदेश में यूपीए गठबंधन की सरकार सतह पर एकता का प्रदर्शन कर रही है, लेकिन भीतरखाने दरारें और गहरी होती जा रही हैं। राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की हार ने इस दरार को और उजागर कर दिया। हार के बाद सहयोगी दलों के बीच तल्खी बढ़ी है, पर सार्वजनिक मंचों पर “ऑल इज़ वेल” का मुखौटा पहनने की कोशिश जारी है। यही दोहरी राजनीति झारखंड की सत्ता का असली चेहरा बन गई है

झारखंड में गठबंधन की मजबूरी और कांग्रेस की चुनौती
–धर्मेंद्र कुमार
झारखंड की राजनीति इस समय दिल मिले ना मिले, हाथ मिलाते रहिए कहावत जैसी हो गई है। प्रदेश में यूपीए गठबंधन की सरकार सतह पर एकता का प्रदर्शन कर रही है, लेकिन भीतरखाने दरारें और गहरी होती जा रही हैं। राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की हार ने इस दरार को और उजागर कर दिया। हार के बाद सहयोगी दलों के बीच तल्खी बढ़ी है, पर सार्वजनिक मंचों पर “ऑल इज़ वेल” का मुखौटा पहनने की कोशिश जारी है। यही दोहरी राजनीति झारखंड की सत्ता का असली चेहरा बन गई है।
कांग्रेस की स्थिति: सांप-छुछुंदर
कांग्रेस की हालत झारखंड में सांप-छुछुंदर जैसी हो गई है। सत्ता में रहते हुए भी वह न तो गठबंधन पर पूरी तरह हावी हो पा रही है, न ही स्वतंत्र राजनीतिक ताक़त के रूप में ही उभर पा रही है। चुनावी हार ने उसकी विश्वसनीयता पर गहरा आघात किया है। सहयोगी दलों के बीच उसका स्थान अब “ज़रूरी लेकिन असुविधाजनक साथी” जैसा बन गया है। पिछले दिनों कांग्रेस कोटे के मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने अंगरक्षकों के लिए गाड़ी उपलब्ध नहीं कराए जाने पर नाराज होकर उन्होंने अपने सभी सुरक्षा कर्मियों को वापस कर दिया। लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री से सीधे टकराव से परहेज़ किया। दिलचस्प बात यह है कि गृह मंत्रालय मुख्यमंत्री के पास है, फिर भी विरोध का निशाना सीधे उन पर नहीं साधा गया। यह गठबंधन की मजबूरी और भीतर ही भीतर चल रही खींचतान को दर्शाता है। यही हाल कुछ अन्य मंत्रियों का भी है, जो अपने सहयोगियों से नाराज तो है लेकिन केबिनेट मीटिंग खुल कर इजहार नहीं कर रहे हैं।
मीडिया की भूमिका
मीडिया भी इस अस्थिरता को हवा देने में पीछे नहीं है। सूत्रों के हवाले से लगातार यह सिगूफा छोड़ा जाता है कि बीजेपी और जेएमएम मिलकर नई सरकार बना सकते हैं। ऐसे कयास गठबंधन दलों की धड़कनें तेज़ कर देते हैं और असुरक्षा की भावना को गहरा करते हैं।
गठबंधन का इतिहास
झारखंड की राजनीति हमेशा से अस्थिरता और गठबंधन की खींचतान का अखाड़ा रही है। आज कांग्रेस की स्थिति सांप-छुछुंदर जैसी और सहयोगी दलों के बीच लुका-छिपी का खेल—ये कोई नई कहानी नहीं है, बल्कि झारखंड की राजनीतिक परंपरा का ही विस्तार है। झारखंड राज्य का गठन वर्ष 2000 में होने के बाद से ही झारखंड में स्थिर सरकारें अपवाद रही हैं। 2005–2010 के बीच कई बार सरकारें बनीं और गिरीं, कभी बीजेपी–जेएमएम गठबंधन, कभी स्वतंत्र विधायकों के समर्थन से। वहीं 2013 में मधु कोड़ा प्रकरण ने दिखा दिया कि सत्ता के समीकरण कितने जल्दी बदल सकते हैं। 2019 में यूपीए गठबंधन ने सत्ता संभाली, लेकिन शुरू से ही कांग्रेस की भूमिका “सहयोगी” से ज़्यादा “निर्भर” रही।
झारखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां गठबंधन सरकारें अक्सर विश्वास और अविश्वास के बीच झूलती रही हैं। आज की स्थिति भी उसी परंपरा का हिस्सा है। प्रदेश की राजनीति फिलहाल लुका-छिपी के खेल में फँसी हुई है। सतह पर एकता और भीतर अविश्वास—यही गठबंधन की असली कहानी है। कांग्रेस के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है। अगर वह गठबंधन को संभालने में असफल रही तो विपक्षी दलों के लिए सत्ता परिवर्तन का रास्ता और आसान हो जाएगा।



