क्या कांग्रेस अपनी एकजुटता से बीजेपी को मात देगी? — धर्मेंद्र कुमार
मध्यप्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव इस बार केवल संख्याओं का खेल नहीं बल्कि दलों की अनुशासन और रणनीति की परीक्षा भी है। मध्यप्रदेश विधानसभा में कुल 230 सीटें हैं। इस आधार पर एक राज्यसभा सीट के लिए 58 विधायकों का समर्थन चाहिए। वहीं विधानसभा में बीजेपी के पास कुल 163 विधायक हैं, जिसके आधार पर बीजेपी के पक्ष में दो सीट का जाना तय है। तीसरे सीट के लिए बीजेपी को 11 अतिरिक्त विधायकों का समर्थन चाहिए

क्या कांग्रेस अपनी एकजुटता से बीजेपी को मात देगी?
— धर्मेंद्र कुमार
मध्यप्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव इस बार केवल संख्याओं का खेल नहीं बल्कि दलों की अनुशासन और रणनीति की परीक्षा भी है। मध्यप्रदेश विधानसभा में कुल 230 सीटें हैं। इस आधार पर एक राज्यसभा सीट के लिए 58 विधायकों का समर्थन चाहिए। वहीं विधानसभा में बीजेपी के पास कुल 163 विधायक हैं, जिसके आधार पर बीजेपी के पक्ष में दो सीट का जाना तय है। तीसरे सीट के लिए बीजेपी को 11 अतिरिक्त विधायकों का समर्थन चाहिए।
कांग्रेस के पास कुल 66 विधायक हैं। यदि कांग्रेस के विधायक अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए मतदान से अपने को अलग करते हैं, तो बीजेपी के तीसरे प्रत्याशी की हार निश्चित है। इस प्रकार कांग्रेस मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द करने का बदला लेकर बीजेपी को उसकी भाषा में ही जवाब दे सकती है। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग को मजबूरी में तीसरी सीट के लिए पुनः चुनाव कराना पड़ेगा और कांग्रेस को एक बार फिर मौका मिल सकता है
पहले ऐसी स्थिति कब हुई थी?
राज्यसभा चुनावों का संचालन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत आता है। इस अनुच्छेद के तहत चुनाव आयोग को यह अधिकार है कि यदि किसी सीट पर चुनाव प्रक्रिया पूर्ण न हो पाए। जैसे कि कोई उम्मीदवार आवश्यक मतों की संख्या प्राप्त न कर सके या मतदान अमान्य घोषित हो जाए। तो आयोग उस सीट को रिक्त घोषित कर पुनः चुनाव की अधिसूचना जारी करता है। भारत में राज्यसभा चुनावों में पुनः मतदान या पुनः चुनाव की स्थिति बहुत कम देखने को मिली है, लेकिन कुछ घटनाओं का यहां जिक्र करना आवश्यक हैं।
•1988 में उत्तर प्रदेश में एक सीट पर मतदान विवादित होने के कारण पुनः चुनाव कराना पड़ा था।
•2009 में झारखंड में क्रॉस वोटिंग और मतपत्र अमान्य घोषित होने के कारण एक सीट पर पुनः मतदान हुआ था।
•2020 में गुजरात में एक उम्मीदवार के नामांकन विवाद के चलते चुनाव स्थगित कर पुनः अधिसूचना जारी करनी पड़ी थी।
इन सभी मामलों में चुनाव आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए पुनः चुनाव कराया था।
वर्तमान समय में कांग्रेस को अपने प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन की नामांकन रद्द किए जाने मामले में हाय तौबा मचाने के बजाय अपनी एकजुटता और अनुशासन का परिचय देने की आवश्यकता है। इस तरह वह भाजपा की रणनीति को विफल कर सकती है। कांग्रेस यदि एकजुटता दिखाती है, तो भाजपा को उसके ही चाल में मात दी जा सकती है।
यदि कांग्रेस असफल रही तो परिणाम
यदि कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखने में असफल रहती है और भाजपा को क्रॉस वोटिंग या विपक्षी विधायकों के समर्थन का लाभ मिल जाता है, तो तीसरी सीट भी भाजपा के खाते में चली जाएगी। ऐसी स्थिति में कांग्रेस न केवल राज्यसभा में अपनी संभावित ताक़त खो देगी, बल्कि यह संदेश भी जाएगा कि पार्टी अपने ही विधायकों पर नियंत्रण रखने में अक्षम है। यह पराजय कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी और अनुशासनहीनता को उजागर करेगी, जिससे भविष्य के चुनावों में उसकी विश्वसनीयता और भी कमज़ोर पड़ सकती है।
मध्यप्रदेश का राज्यसभा चुनाव यह साबित कर सकता है कि संख्या बल से कहीं अधिक मायने रखता है दलों का अनुशासन और एकजुटता। यह चुनाव कांग्रेस के लिए केवल सीट बचाने का नहीं, बल्कि अपनी संगठनात्मक शक्ति और अनुशासन का प्रदर्शन करते हुए भाजपा को उसकी भाषा में जवाब देने का अवसर भी है।




