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श्री श्री शीतला माता मंदिर टुइलाडुंगरी में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया हलषष्ठी ‘कमर छठ’ पर्व

सैकड़ों माताओं ने संतान की दीर्घायु, आरोग्य एवं सुख-समृद्धि की कामना से किया पूजन

श्री श्री शीतला माता मंदिर टुइलाडुंगरी में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया हलषष्ठी ‘कमर छठ’ पर्व

सैकड़ों माताओं ने संतान की दीर्घायु, आरोग्य एवं सुख-समृद्धि की कामना से किया पूजन

जमशेदपुर, ््््््््््- श्री श्री शीतला माता मंदिर, टुइलाडुंगरी में आज हलषष्ठी ‘कमर छठ’ का पर्व श्रद्धा, आस्था एवं पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मंदिर परिसर में सैकड़ों महिलाओं ने विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना कर अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि एवं मंगलमय जीवन की कामना की।

महिलाओं की सुविधा और सामूहिक पूजा की परंपरा को ध्यान में रखते हुए मंदिर समिति द्वारा मंदिर के सभागार में विशेष रूप से अस्थायी तालाब (सगरी) का निर्माण कराया गया था। इसी तालाब के समीप महिलाओं ने सामूहिक रूप से हलषष्ठी माता का पूजन, कथा श्रवण एवं पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न किए।

इस अवसर पर मंदिर समिति के अध्यक्ष दिनेश कुमार, कार्यकारी अध्यक्ष मोतीलाल साहू, महामंत्री गिरधारी लाल एवं उपाध्यक्ष परमानंद कौशल, कोषाध्यक्ष त्रिवेणी कुमार, के नेतृत्व में पूजा-अर्चना एवं श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं की गईं।


संतान की मंगलकामना से जुड़ा है हलषष्ठी व्रत

इस अवसर पर मंदिर समिति के अध्यक्ष दिनेश कुमार ने कहा कि “हलषष्ठी ‘कमर छठ’ केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि मातृत्व की श्रद्धा, संतान के प्रति ममता और भारतीय लोक परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति है। माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ यह कठिन व्रत रखती हैं। ऐसे पर्व हमारी संस्कृति, संस्कार और पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करने का कार्य करते हैं

उन्होंने कहा कि हलषष्ठी को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम के जन्म से भी जोड़ा जाता है। भगवान बलराम का प्रमुख आयुध हल है, इसलिए इस पर्व का संबंध कृषि, श्रम, धरती और प्रकृति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को माताएं अपनी संतान के कल्याण के लिए यह व्रत करती हैं।

पूजन में प्रकृति और कृषि संस्कृति की झलक

हलषष्ठी की पूजा में क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार झरबेरी, पलाश और कांस/कुश जैसी वनस्पतियों के साथ विभिन्न अनाज एवं पारंपरिक सामग्री का उपयोग किया जाता है। कई स्थानों पर प्रतीकात्मक तालाब बनाकर उसके समीप पूजा करने की परंपरा है।

पूजन सामग्री में परंपरा के अनुसार महुआ, पसहर/पसही चावल, भुने अनाज, चना, जौ, धान, अरहर, मूंग, मक्का, पलाश, झरबेरी, कांस तथा कुश आदि का उपयोग किया जाता है। कई क्षेत्रों में भैंस के दूध, दही और घी का भी विशेष महत्व माना जाता है।

हलषष्ठी की एक प्रमुख मान्यता यह भी है कि व्रती महिलाएं हल से जुती हुई भूमि में उत्पन्न अनाज-सब्जियों के स्थान पर तालाब में पैदा होने वाली अथवा बिना हल के उगने वाली पारंपरिक खाद्य सामग्री को महत्व देती हैं। हालांकि इसकी विधि और सामग्री क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

भारतीय संस्कृति में मातृशक्ति की आस्था का पर्व

मंदिर समिति के अध्यक्ष दिनेश कुमार ने कहा कि ऐसे पर्व समाज को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ते हैं। हलषष्ठी में एक ओर जहां संतान के प्रति मां की निःस्वार्थ भावना दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति, कृषि और लोकजीवन के प्रति भारतीय समाज की गहरी आस्था भी प्रतिबिंबित होती है।

उन्होंने कहा कि श्री श्री शीतला माता मंदिर समिति भविष्य में भी धार्मिक एवं सामाजिक आयोजनों को श्रद्धालुओं की सुविधा और भारतीय संस्कृति की परंपराओं के अनुरूप भव्य एवं सुव्यवस्थित रूप से आयोजित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

महिलाओं को पूजा और कथा सुनने का कार्य परमानंद कौशल ने किया।

कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु महिलाएं जमुना निषाद, इंदा साहू, मंजू साहू, द्रोपदी साहू, हेमा साहू, मंजू ठाकुर, पिंकी कुमारी, कमला निषाद, फुलेश्वरी निषाद, फूलों देवी, पुष्पा निषाद, कुंती देवी, राजवती देवी, देववती, चित्रा साहू, पार्वती देवी, चंदा देवी, सोनी, पूनम ठाकुर, तिज्या निषाद, प्राची निषाद उपस्थित रहीं और मंदिर परिसर में पूरे वातावरण में भक्ति, श्रद्धा एवं मंगलकामनाओं का भाव दिखाई दिया। युवाओं में सहयोग करने वाले में रोशन साहू, ओम निषाद, दीपक सिन्हा आदि।

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