अर्जुन मुंडा पूर्व केंद्रीय मंत्री भारत सरकार एवं पूर्व मुख्यमंत्री, झारखण्ड वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर अवगत कराया है
खूंटी जिलान्तर्गत प्रखंड-खूंटी के ग्राम बगडू निवासी एक आदिवासी महिला, स्व० श्रीमती बुधन पूर्ति की बिरसा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च सेंटर, खूंटी में कथित घोर चिकित्सीय लापरवाही के कारण हुई मृत्यु ने न केवल एक परिवार को अपूरणीय पीड़ा प्रदान की है, बल्कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता, जवाबदेही एवं मानवीय दायित्वों के संबंध में कुछ गंभीर प्रश्न भी हमारे समक्ष उपस्थित किए हैं। एक ऐसे राज्य में, जिसकी पहचान आदिवासी अस्मिता, सामाजिक न्याय एवं मानवीय मूल्यों के संरक्षण से रही है, यह घटना हम सभी के लिए गहन आत्ममंथन का विषय है

अर्जुन मुंडा पूर्व केंद्रीय मंत्री भारत सरकार एवं पूर्व मुख्यमंत्री, झारखण्ड ने वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर अवगत कराया है

खूंटी जिलान्तर्गत प्रखंड-खूंटी के ग्राम बगडू निवासी एक आदिवासी महिला, स्व० श्रीमती बुधन पूर्ति की बिरसा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च सेंटर, खूंटी में कथित घोर चिकित्सीय लापरवाही के कारण हुई मृत्यु ने न केवल एक परिवार को अपूरणीय पीड़ा प्रदान की है, बल्कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता, जवाबदेही एवं मानवीय दायित्वों के संबंध में कुछ गंभीर प्रश्न भी हमारे समक्ष उपस्थित किए हैं। एक ऐसे राज्य में, जिसकी पहचान आदिवासी अस्मिता, सामाजिक न्याय एवं मानवीय मूल्यों के संरक्षण से रही है, यह घटना हम सभी के लिए गहन आत्ममंथन का विषय है।
झारखंड केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है बल्कि यह संविधान प्रदत्त विशेष प्रावधानों, विशेषकर पाँचवीं अनुसूची के मूल उद्देश्यों एवं आदिवासी समाज के अधिकारों, सम्मान एवं संरक्षण के प्रति हमारी सामूहिक संवेदनशीलता का भी प्रतीक है। संविधान निर्माताओं ने पाँचवीं अनुसूची के माध्यम से आदिवासी समाज के जीवन, आजीविका, संस्कृति एवं उनके समग्र कल्याण के संरक्षण का जो दायित्व राज्य को सौंपा है उसमें स्वास्थ्य एवं जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है। आज जब राज्य में पाँचवीं अनुसूची, परिसीमन एवं आदिवासी समाज से जुड़े विभिन्न संवेदनशील विषयों पर व्यापक चर्चा हो रही है, तब ऐसी घटनाएँ केवल एक व्यक्ति अथवा एक परिवार की त्रासदी बनकर नहीं रह जातीं, बल्कि वे संवैधानिक मूल्यों एवं राज्य की जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह खड़ा करती हैं। क्योंकि देश में जनसंख्या आधारित निति निर्धारण की जाती है
यह अत्यंत चिंता का विषय है कि एक ओर हम संवैधानिक प्रावधानों के संरक्षण एवं आदिवासी हितों के संवर्धन की बात करते हैं, वहीं दूसरी और यदि एक आदिवासी महिला को उपचार के दौरान अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता है, तो यह केवल जीवन से खिलवाड़ नहीं, बल्कि संविधान की उस मूल भावना को भी आहत करता है, जो समाज के सबसे वंचित एवं संवेदनशील वर्ग को विशेष संरक्षण प्रदान करने की अपेक्षा रखती है। ऐसी घटनाओं के दूरगामी एवं प्रतिकूल परिणाम केवल स्वास्थ्य व्यवस्था तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे आदिवासी समाज के मन में व्यवस्था एवं संवैधानिक संस्थाओं के प्रति विश्वास को भी प्रभावित करते हैं।
मैं इस प्रकरण को एक उदाहरण के रूप में आपके संज्ञान में ला रहा हूँ। आवश्यकता इस बात की है कि हम इस प्रकार की घटनाओं को केवल पृथक-पृथक चिकित्सीय त्रुटियों के रूप में न देखें, बल्कि आदिवासी एवं दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, उनकी उपलब्धता एवं संस्थागत जवाबदेही के व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी विचार करें। आज भी राज्य के अनेक आदिवासी एवं सुदूरवर्ती क्षेत्रों में औसत से अधिक मृत्यु दर चिंता का विषय बनी हुई है। ऐसी परिस्थितियों में चिकित्सीय लापरवाही से होने वाली आकस्मिक मृत्यु की घटनाएँ स्थिति को और अधिक गंभीर बना देती हैं।
यह उल्लेख करना भी प्रासंगिक होगा कि विगत अक्टूबर, 2025 में पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) में पाँच मासूम थैलेसीमिया पीड़ित जनजातीय बच्चों को एच०आई०वी० संक्रमित रक्त चढ़ा दिए जाने की अत्यंत दुःखद एवं संवेदनशील घटना भी प्रकाश में आई थी। यह तथ्य हमें स्वास्थ्य व्यवस्था के विभिन्न स्तरों पर आवश्यक संस्थागत सुधारों एवं प्रभावी निगरानी तंत्र की आवश्यकता का पुनः स्मरण कराता है। यदि इस प्रकार की घटनाओं की समयबद्ध एवं गंभीर समीक्षा नहीं की जाती है, तो इसका सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव समाज के उन वर्गों पर पड़ेगा, जिन्हें संविधान ने विशेष संरक्षण प्रदान किया है।
प्राप्त तथ्यों के अनुसार, स्व० बुधन पूर्ति को उपचार के क्रम में गलत रक्त समूह (Mismatched Blood Group) का रक्त चढ़ा दिया गया, जिसके फलस्वरूप उनका निधन हो गया। यदि यह तथ्य सत्य हैं, तो यह केवल चिकित्सीय लापरवाही का विषय नहीं है, बल्कि जीवन की रक्षा के सर्वोपरि दायित्व के निर्वहन में हुई एक अत्यंत गंभीर एवं दुर्भाग्यपूर्ण चूक भी है। जिस चिकित्सा व्यवस्था पर एक मरीज अपना जीवन एवं विश्वास दोनों समर्पित करता है, उसके द्वारा ही उसके जीवन की रक्षा सुनिश्चित न हो पाना अत्यंत पीड़ादायक एवं चिंतनीय है।
मेरा विनम्र आग्रह है कि इस अत्यंत संवेदनशील प्रकरण की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष एवं समयबद्ध जाँच सुनिश्चित करते हुए दोषियों के विरुद्ध कठोर एवं विधिसम्मत कार्रवाई की जाए। साथ ही, आदिवासी बहुल एवं सुदूरवर्ती क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, रक्ताधान (Blood Transfusion) जैसी जीवनरक्षक प्रक्रियाओं के मानकों के अनुपालन तथा निजी एवं सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु एक प्रभावी एवं संस्थागत व्यवस्था विकसित किए जाने पर भी गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना अपेक्षित होगा।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपके नेतृत्व में स्व० बुधन पूर्ति के शोकाकुल परिवार को न्याय दिलाने के साथ-साथ ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने हेतु आवश्यक एवं प्रभावी कदम उठाए जाएंगे। यह न केवल एक आदिवासी महिला के जीवन एवं गरिमा के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता का परिचायक होगा, बल्कि झारखंड की उस मूल आत्मा के अनुरूप भी होगा, जिसका आधार सामाजिक न्याय, संवैधानिक मूल्यों एवं आदिवासी समाज के सम्मान और संरक्षण पर आधारित है।



