पंडवानी लोकगायिका तीजनबाई की आवाज सदा के लिए मौन -धर्मेंद्र कुमार
जब छत्तीसगढ़ की माटी से उठी एक आवाज ने देश-विदेश के मंचों पर ‘पांडवों की गाथा’ गाई तो लगा जैसे महाभारत फिर से जीवित हो उठा। वो आवाज थी छतीसगढ़ की तीजनबाई की। पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तीजनबाई सिर्फ एक लोकगायिका नहीं थी, बल्कि वो छत्तीसगढ़ की आत्मा और भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति ‘लोक संस्कृति’ का प्रतीक हैं

पंडवानी लोकगायिका तीजनबाई की आवाज सदा के लिए मौन
-धर्मेंद्र कुमार
जब छत्तीसगढ़ की माटी से उठी एक आवाज ने देश-विदेश के मंचों पर ‘पांडवों की गाथा’ गाई तो लगा जैसे महाभारत फिर से जीवित हो उठा। वो आवाज थी छतीसगढ़ की तीजनबाई की। पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तीजनबाई सिर्फ एक लोकगायिका नहीं थी, बल्कि वो छत्तीसगढ़ की आत्मा और भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति ‘लोक संस्कृति’ का प्रतीक हैं। 5 जुलाई 2026 को रायपुर के एम्स अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांसे ली और पंडवानी लोक गायिका की वो खनकती बुलंद आवाज सदा के लिए खामोश हो गई। आपको बता दे कि तीजनबाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को छत्तीसगढ़ के दूर्ग जिले के भिलाई शहर के निकट गनियारी गांव के हनुकलाल परधा और सुखवंत्ती के घर में हुआ था। बचपन से ही अपने नाना पंडवानी लोकगायक ब्रजलाल से महाभारत सुनते सनते तीजन ने महाभारत को कंठस्थ कर लिया। उनकी अद्भुत प्रतिभा औऱ लगन को देखते हुए उमेद सिंह देशुमख ने उन्हें अनौपचारिक प्रशिक्षण दिया था। विलक्षण प्रतिभा की धनी तीजनबाई ने मात्र 13 साल की उम्र में पहली बार तंबूरा उठाया और ‘भीम’ की कथा गाई। समाज ने विरोध किया “औरत मंच पर कैसे गाएगी?” पर तीजनबाई झुकी नहीं। उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और देश ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छतीसगढ़ की पंडवानी लोक संस्कृति को जीवंत कर दिया। तीजनबाई का विवाह तुक्का राम से हुई थी।
लोक कला को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया
पंडवानी परंपरागत रूप से पुरुषों की कला थी। तीजनबाई ने इस किले को तोड़ा। उन्होंने साबित किया कि महिला भीम की ताकत और अर्जुन की रणनीति उतनी ही दमदार ढंग से गा सकती है। जब वो मंच पर ‘कीचक वध’ या ‘द्रौपदी चीर हरण’ गाती थी तो दर्शक भावुक होकर रो पड़ते थे। वो सिर्फ कथा नहीं सुनातीं थी, बल्कि वो हर प्रसंग को मंच ‘जीती’ थी। उनकी आंखों में आंसू, आवाज में गुस्सा, और तंबूरे की ठनक में पूरा महाभारत उतर आता था। जहां वो वेदमती शैली में वो खुद पात्र बनकर संवाद करती तो वहीं कापालिक शैली में वो एक हाथ में तंबूरा, दूसरे हाथ में करताल और सिर पर चुटिया बांधकर खुद ही भीम, द्रौपदी, अर्जुन बन जाती थी। 3 घंटे तक बिना रुके गाना ये कोई रियाज नहीं बल्कि लोक संस्कृति के प्रति उनका समर्पण और तपस्या थी।
पहले पंडवानी सिर्फ गांव के चौपाल तक सीमित थी। तीजनबाई ने इसे दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम, फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका तक पहुंचाया। भारत सरकार ने लोक कला के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से सम्मानित किया। तीनों पद्म पाने वाली वो पहली लोक कलाकार हैं। उनके कारण सरकार ने भी पंडवानी को संरक्षित किया। आज छत्तीसगढ़ में पंडवानी विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाती है। उनके शिष्य अब देशभर में इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं।
जमशेदपुर से गहरा रिश्ता था
लोक गायिका तीजन बाई का जमशेदपुर से गहरा रिश्ता रहा है। बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि जमशेदपुर में पहली बार 1970 के दशक में तीजनबाई ने लगभग 15 वर्ष की उम्र में बर्मामाइन्स के एस टाइप मैदान में अपनी प्रस्तुति से लोगों बहुत प्रभावित किया था। बर्मामाइन्स में तीजनबाई के दूर के रिश्तेदार रहते थे। उनके आग्रह पर तीजनबाई ने अपनी कला की प्रस्तुति दी थी। वहीं दूसरी बार 2014 के नवंबर माह में आयोजित संस्कृति संगम कार्यक्रम में तीजनबाई में अपने बेहतरीन प्रस्तुति से समा बांध दिया था।
तीजनबाई का जीवन हमें यह सिखाता है कि कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक विद्रोह और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम भी है। उन्होंने परंपरा को चुनौती दी, और उस चुनौती से ही नई परंपरा का जन्म हुआ।
तीजनबाई ने हमें सिखाया कि असली भारत गांवों में बसता है, किताबों में नहीं। उन्होंने बिना डिग्री, बिना अंग्रेजी, बिना राजनीति के पूरे विश्व को भारत का महाभारत समझा दिया। जब तक तंबूरे की एक भी तार बजेगी, तब तक तीजनबाई की आवाज में भीम दहाड़ता रहेगा। और जब तक भीम दहाड़ेगा, तब तक भारत अपनी जड़ों को नहीं भूलेगा।

