यहां सब कुछ बिकता है, बस खरीददार होना चाहिए -धर्मेंद्र कुमार
आज का समाज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां हर चीज़—विचार, मूल्य, रिश्ते, यहां तक कि लोकतंत्र भी बाज़ार की भाषा समझता औऱ बोलता है। यहां हर चीज़ की कीमत तय है। चाहे वह वस्तु हो, विचार हो, या फिर इंसान की ईमानदारी, सब कुछ बाज़ार की भाषा में अनुवादित हो चुका है। “यहां सब कुछ बिकता है, बस खरीददार होना चाहिए यह वाक्य केवल व्यापारिक यथार्थ नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन का आईना बन गया है। जहां नैतिकता से लेकर लोकतंत्र तक, जब मूल्य का पैमाना केवल ‘मांग और आपूर्ति’ रह जाए, जब वोट, नौकरी, न्याय और जान का रेट लगने लगे, तो समझिए कि बाजार में इंसानियत सबसे सस्ती हो गई है

यहां सब कुछ बिकता है, बस खरीददार होना चाहिए -धर्मेंद्र कुमार
आज का समाज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां हर चीज़—विचार, मूल्य, रिश्ते, यहां तक कि लोकतंत्र भी बाज़ार की भाषा समझता औऱ बोलता है। यहां हर चीज़ की कीमत तय है। चाहे वह वस्तु हो, विचार हो, या फिर इंसान की ईमानदारी, सब कुछ बाज़ार की भाषा में अनुवादित हो चुका है। “यहां सब कुछ बिकता है, बस खरीददार होना चाहिए यह वाक्य केवल व्यापारिक यथार्थ नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन का आईना बन गया है। जहां नैतिकता से लेकर लोकतंत्र तक, जब मूल्य का पैमाना केवल ‘मांग और आपूर्ति’ रह जाए, जब वोट, नौकरी, न्याय और जान का रेट लगने लगे, तो समझिए कि बाजार में इंसानियत सबसे सस्ती हो गई है।
राजनीति और लोकतंत्र
चुनावी राजनीति में विचारधारा और जनहित का स्थान अब धनबल और प्रचार-तंत्र ने ले लिया है। टिकट से लेकर सत्ता तक, विधायक से लेकर सांसद तक सब कुछ एक सौदेबाज़ी की तरह दिखता है। लोकतंत्र का मूल भाव—जनसेवा—धीरे-धीरे ‘निवेश पर लाभ’ की मानसिकता में बदलता जा रहा है। जहां सदन में प्रश्न पूछने के लिए जनप्रतिनिधि बिकते हैं। जनता की आवाज़ अब विज्ञापन अभियानों और मीडिया मैनेजमेंट में खो जाती है।
समाज और नैतिकता
रिश्ते और विश्वास भी अब लेन-देन की कसौटी पर खरे उतरते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी बाज़ार की वस्तु बन चुकी हैं। NEET का पेपर 10 लाख में बिकता है। ट्रांसफर का रेट जिले के हिसाब से लगता है। फर्जी डिग्री 50 हजार में मिलता है मतलब मेहनत सस्ती, “सेटिंग” महंगी। कोर्ट में तारीख बिकती है। थाने में एफआईआर का रेट लगता है। जिसके पास पैसा है उसकी फाइल तेज, जिसके पास नहीं उसकी जिंदगी लंबित। नैतिकता का मूल्य तब तक है जब तक उसका कोई खरीदार मौजूद है, अन्यथा वह केवल किताबों में दर्ज आदर्श रह जाती है। यहां तक कि धर्म और अध्यात्म भी ‘पैकेज्ड प्रोडक्ट’ बनकर बिक रहे हैं।
मीडिया और जनमत
समाचार चैनल और अखबार भी अब कंटेंट बेचते हैं, सत्य नहीं। जनमत को आकार देने वाली ताकतें विज्ञापन और प्रायोजित खबरों के ज़रिए जनता की सोच को दिशा देती हैं। यहां भी वही नियम लागू है—जो खरीदेगा, वही सच कहलाएगा। पत्रकारिता का आदर्श अब टीआरपी और क्लिकबेट की भेंट चढ़ चुका है।
संस्कृति और मूल्य
कला और साहित्य भी अब प्रायोजकों और बाजार की मांग पर निर्भर हैं। कलाकार की रचनात्मकता का मूल्य तभी है जब उसे कोई खरीदार मिले। समाज में आदर्श और मूल्य धीरे-धीरे ‘ब्रांड वैल्यू’ में बदलते जा रहे हैं। यहां ईमान बिकता है, बेईमान बिकता है इंसान की क्या बात करें यहां तो भगवान भी बिकते हैं। लेकिन आज भी सैनिक की शहादत और मां की आंसू नहीं बिकता क्योंकि वह अनमोल है।
यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहरी सामाजिक और नैतिक चुनौती है। यदि हर चीज बिकाऊ है, तो समाज का आधार—विश्वास और मूल्य—कहां टिकेगा? सवाल यही है कि क्या हम केवल खरीददार और विक्रेता बनकर रह जाएँगे, या फिर कुछ चीज़ों को अमूल्य मानकर बचाने की कोशिश भी करेंगे।


