देर आए दुरुस्त आए’ या सत्ता के अहंकार की पराजय?
आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। जो भारतीय लोकतंत्र में जनता और विशेषकर युवाओं व छात्रों की शांतिपूर्ण आंदोलन की जीत है। जिसको सत्ता लंबे समय से नजरअंदाज करने की भूल कर रही थी। 25 जुलाई 2026 को दिया गया यह इस्तीफा केवल एक मंत्री का जाना नहीं है, बल्कि देश की जर्जर हो चुकी परीक्षा प्रणाली और जवाबदेही से भागती सरकार के मुंह पर एक करारा तमाचा भी है। यह फैसला बहुत पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन 'हुजूर' को जंतर-मंतर की सड़कों पर गूंजते युवाओं के बुलंद आवाज को सुनने में बहुत वक्त लग गया

देर आए दुरुस्त आए’ या सत्ता के अहंकार की पराजय?
आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। जो भारतीय लोकतंत्र में जनता और विशेषकर युवाओं व छात्रों की शांतिपूर्ण आंदोलन की जीत है। जिसको सत्ता लंबे समय से नजरअंदाज करने की भूल कर रही थी। 25 जुलाई 2026 को दिया गया यह इस्तीफा केवल एक मंत्री का जाना नहीं है, बल्कि देश की जर्जर हो चुकी परीक्षा प्रणाली और जवाबदेही से भागती सरकार के मुंह पर एक करारा तमाचा भी है। यह फैसला बहुत पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन ‘हुजूर’ को जंतर-मंतर की सड़कों पर गूंजते युवाओं के बुलंद आवाज को सुनने में बहुत वक्त लग गया।
जब व्यवस्था खुद बन जाए माफिया
3 मई 2026 को आयोजित हुई NEET-UG परीक्षा की शुचिता जब तार-तार हुई, तभी नैतिक आधार पर इस इस्तीफे की पटकथा लिखी जा चुकी थी। करोड़ों छात्रों के भविष्य को दांव पर लगाकर जब परीक्षा माफिया समानांतर सरकार चला रहे थे, तब शिक्षा मंत्रालय शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छिपाए बैठा था। शुरुआती दौर में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी से इनकार करना और फिर चौतरफा घिरने पर जांच सीबीआई को सौंपना, यह दर्शाता है कि शीर्ष स्तर पर संवेदनशीलता का कितना घोर अभाव था। जिन युवाओं को देश का कर्णधार कहा जाता है, उन्हें परीक्षा केंद्रों से लेकर न्याय की गुहार लगाने तक, सिर्फ मानसिक प्रताड़ना और लाठियां ही नसीब हुईं।
‘कॉकरोच’ का पलटवार और नागरिक चेतना
इस पूरे घटनाक्रम में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले उभरा छात्र आंदोलन भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया जाएगा। विडंबना देखिए, जिस तंत्र ने देश के बेरोजगार और हताश युवाओं को उपेक्षा की नजर से देखते हुए ‘कॉकरोच’ जैसे शब्दों से नवाजा था, उसी युवा शक्ति ने इस नाम को अपनी ढाल बना लिया। सीजेपी के इस सत्याग्रह ने साबित कर दिया कि जब पानी सिर से ऊपर चला जाए, तो सड़कों पर उतरा जनसैलाब दिल्ली के सबसे मजबूत सिंहासनों को भी हिला सकता है। जंतर-मंतर पर एक महीने तक डटे रहना, पुलिस की बर्बर लाठीचार्ज को झेलना, और सोनम वांगचुक जैसे विचारकों का आमरण अनशन, इस आंदोलन ने सरकार के उस अहंकार को तोड़ा जो बातचीत की मेज पर आने को भी तैयार नहीं था।
इस्तीफा: नैतिक बोध या राजनीतिक विवशता?
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने त्यागपत्र में ‘राष्ट्रीय एकता’ और ‘छात्रों के मानसिक तनाव’ का हवाला दिया है। परंतु यह आत्मनिरीक्षण तब क्यों नहीं जागा जब पेपर लीक के कारण अवसाद में आकर देश के कई होनहार छात्रों ने आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा लिया था? सत्य तो यह है कि यह इस्तीफा किसी नैतिक बोध का परिणाम नहीं, बल्कि सीजेपी द्वारा सरकार के साथ वार्ता में रखी गई वह ‘अंतिम शर्त थी, जिसे माने बिना सरकार के पास अपनी साख बचाने का कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था।
सिर्फ चेहरे नहीं, नीतियां भी बदलें
अंततः, हुजूर आए तो हैं, पर बहुत देर करके। यह इस्तीफा एक तात्कालिक राहत दे सकता है, लेकिन यह अंतिम समाधान नहीं है। सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई न करने और पीड़ित परिवारों को मुआवजे की मांग पर सहमति तो जताई है, लेकिन मुख्य चुनौती नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) जैसी संस्थाओं के भीतर बैठे भ्रष्टाचार के घुन को साफ करने की है। हालांकि एनटीए के खउछ अधिकारियों क खिलाफ की गई है। लेकिन जब तक परीक्षाओं को पूरी तरह सुरक्षित, पारदर्शी नहीं बनाया जाता है। और पेपर लीक विरोधी कानूनों को धरातल पर कड़ाई से लागू नहीं किया जाता है, तब तक सिर्फ चेहरे बदलने से देश की शिक्षा व्यवस्था नहीं सुधरेगी। दरअसल भविष्य में होने वाली सभी परीक्षाएं पारदर्शी एवं फुलप्रूफ होगी तभी सही मायने में इस छात्र आंदोलन की वास्तविक जीत होगी।


