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राष्ट्रवाद का एकाधिकार संघ का सौ साल और सवाल – धर्मेंद्र कुमार

जब कोई संगठन स्वयं को राष्ट्रभक्ति का ठेकेदार घोषित कर देता है, तो लोकतंत्र की आत्मा असहज हो उठती है। और जब वही संगठन अपने विचारों को एक धर्म, एक संस्कृति और एक भाषा तक सीमित कर लेता है, तो भारत जैसे बहुलतावादी देश में उनके राष्ट्रवादी होने का दावा बेमानी हो जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का सौ साल का सफर एक विचारधारात्मक प्रयोगशाला रहा है, जहां राष्ट्र की परिभाषा को बार-बार गढ़ा गया, बदला गया, और अब सत्ता के गलियारों में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह परिभाषा भारत के संविधान और स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा से मेल खाती है?

राष्ट्रवाद का एकाधिकार संघ का सौ साल और सवाल – धर्मेंद्र कुमार

जब कोई संगठन स्वयं को राष्ट्रभक्ति का ठेकेदार घोषित कर देता है, तो लोकतंत्र की आत्मा असहज हो उठती है। और जब वही संगठन अपने विचारों को एक धर्म, एक संस्कृति और एक भाषा तक सीमित कर लेता है, तो भारत जैसे बहुलतावादी देश में उनके राष्ट्रवादी होने का दावा बेमानी हो जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का सौ साल का सफर एक विचारधारात्मक प्रयोगशाला रहा है, जहां राष्ट्र की परिभाषा को बार-बार गढ़ा गया, बदला गया, और अब सत्ता के गलियारों में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह परिभाषा भारत के संविधान और स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा से मेल खाती है?
संविधान बनाम संगठन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उद्देश्य था—हिंदू समाज को संगठित करना। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या “हिंदू” को राष्ट्र की परिभाषा का केंद्र बनाना, भारत की संवैधानिक आत्मा—”सर्व धर्म समभाव”—से मेल खाता है? भारत का संविधान सर्व धर्म समभाव व धर्मनिरपेक्षता की बात करता है, जबकि संघ का विचार “हिंदू राष्ट्र” की अवधारणा पर टिका है। क्या यह विचारधारा भारत की विविधता को समेटने में सक्षम है, या यह उसे एक संकीर्ण पहचान में समेटने का प्रयास है? भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता प्राप्त है। वहीं अनुच्छेद 51ए(ई) के अनुसार हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह भारत की समृद्ध विरासत को संरक्षित करे, जिसमें विविधता और सहिष्णुता शामिल है। जबकि संघ का विचार ही “हिंदू राष्ट्र” की अवधारणा पर टिका है। यह विचार न तो संविधान में है, न ही स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं की सोच में।

स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका: मौन या मौन समर्थन?

संघ समर्थक यह दावा करते हैं कि डॉ. हेडगेवार स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे, और संघ के कई स्वयंसेवकों ने देश के लिए बलिदान दिया। लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों और स्वतंत्रता आंदोलन के मुख्यधारा नेतृत्व—गांधी, नेहरू, पटेल, बोस—की दृष्टि में संघ की भूमिका नगण्य रही। वहीं संघ के संगठनात्मक रूप में स्वतंत्रता आंदोलन से दूरी स्पष्ट रही। कई इतिहासकार यह प्रश्न उठाते हैं कि जब पूरा देश असहयोग, भारत छोड़ो और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग ले रहा था, तब संघ ने संगठित रूप से क्या किया? क्या यह संगठन ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में अग्रणी था, या केवल सामाजिक संगठन के नाम पर तटस्थ बना रहा? सरदार पटेल ने 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगाते हुए लिखा – “संघ के कुछ सदस्य सांप्रदायिक हिंसा में शामिल थे, जो देश की एकता के लिए खतरा है।”
इतिहास मौन नहीं रहता, वह दस्तावेज़ों में बोलता है।

विचारों का लचीलापन या अवसरवादिता?

महात्मा गांधी ने कहा था कि “मैं ऐसा भारत चाहता हूँ जहां सभी धर्मों को समान सम्मान मिले।” (Harijan, July 1936) वहीं पंडित नेहरू ने संघ के बारे में स्पष्ट कहा था कि “RSS की विचारधारा संकीर्ण है और यह भारत की विविधता को स्वीकार नहीं करती।” (Constituent Assembly Debates, 1949)। जब गांधी की हत्या हुई, तो संघ पर प्रतिबंध लगा। यह प्रतिबंध तब हटाया गया जब उन्होंने संविधान और तिरंगे को स्वीकार करने का लिखित आश्वासन दिया। संघ ने कभी गांधी की आलोचना की, फिर उन्हें राष्ट्रपिता माना। संविधान को विदेशी बताया, फिर उसी संविधान की शपथ लेकर सत्ता में भागीदारी की। यहां यह विचारणीय है कि क्या यह विचारधारा की परिपक्वता थी या राजनीतिक अनुकूलन?

राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र: किसके पास अधिकार?

आज संघ स्वयं को राष्ट्रभक्ति का पर्याय बताता है और असहमति को राष्ट्रविरोध घोषित करता है। लेकिन क्या राष्ट्रभक्ति कोई संगठनात्मक सदस्यता से तय होती है? क्या संविधान की निष्ठा से बड़ा कोई संगठन हो सकता है? जिस संगठन के मुख्यालय में पांच दशकों तक भारतीय तिरंगा नहीं फहराया गया हो जिस संगठन द्वारा भारतीय सिंधान को विदेशी बताया जाता रहा हो। वहीं संगठन आज राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति का ठेकेदार बनकर लोगों को राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र बांट रहा है। जिनका राष्ट्रवाद व राष्ट्रभक्ति की परिभाषा ही संकीर्ण विचारों तक सीमित हो। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई संगठन केवल एक धर्म को केंद्र में रखता है, क्या संपूर्ण पूरे भारत का प्रतिनिधित्व कर सकता है? ऐसे संगठन कभी हजारों वर्षों की गौरवशाली सनातन संस्कृति व परंपराओं का प्रतिनिधित्व नहीं बन सकती हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सौ साल का सफर एक विचारधारात्मक यात्रा है—जिसमें राष्ट्र की परिभाषा को बार-बार गढ़ा गया, लेकिन भारत की आत्मा आज भी संविधान में बसती है, न कि किसी एक विचारधारा में

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