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देवी की आँचल भराई और कुंकुमार्चन का शास्त्र

साडी और चोली वस्त्र-नारियल से देवी का आंचल भरना, यह देवी के दर्शन के समय किया जानेवाला एक प्रमुख उपचार है । यह शास्त्र समझकर, इसे भावपूर्ण करने से, उसका आध्यात्मिक लाभ अधिक प्रमाण में श्रद्धालु को मिलता है

देवी की आँचल भराई और कुंकुमार्चन का शास्त्र

साडी और चोली वस्त्र-नारियल से देवी का आंचल भरना, यह देवी के दर्शन के समय किया जानेवाला एक प्रमुख उपचार है । यह शास्त्र समझकर, इसे भावपूर्ण करने से, उसका आध्यात्मिक लाभ अधिक प्रमाण में श्रद्धालु को मिलता है

*१. देवी की आंचलभराई का क्या महत्त्व है ?*
‘देवी को साडी एवं चोली वस्त्र अर्पण कर, अर्थात देवी की आंचलभराई कर, देवीपूजन संपन्न करना होता है । देवी को साडी एवं चोली वस्त्र अर्पित करना, अर्थात अपनी आध्यात्मिक उन्नति अथवा कल्याण हेतु देवी के निर्गुण तत्त्व को सगुण में आने का आवाहन करना । सर्व पंचोपचार पूजाविधियां ईश्‍वर के निर्गुण रूप से संबंधित हैं । देवी की आंचलभराई करते समय, प्रत्यक्ष कार्य हेतु देवी से प्रार्थना की जाती है । इससे पूर्व पंचोपचार विधि से कार्यरत देवी के निर्गुण तत्त्व को, साडी एवं चोली वस्त्र के माध्यम से, मूर्त सगुण रूप में साकार होने हेतु सहायता मिलती है ।’

*२. देवी की आंचलभराई की उचित पद्धति*

अ. देवी को लाल चुनरी भी चढाते हैं । लाल रंग शक्तितत्त्व सर्वाधिक आकृष्ट करता है । स्त्रियां लाल चुनरी एवं नारियल से देवी का आंचल भरती हैं ।

आ. देवी को सूती अथवा रेशमी साडी अर्पण करें; क्योंकि इन धागों में देवता से प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगें ग्रहण करने एवं संजोए रखने की क्षमता अधिक होती है ।

इ. एक थाली में साडी रखकर उस पर चोली वस्त्र, नारियल (चोटी देवी की ओर कर) तथा थोडे से चावल रखें । नारियलकी चोटी देवी की ओर हो । तत्पश्‍चात थाली में रखी सर्व वस्तुएं अपने हाथों की अंजुलि में लेकर, हाथ अपनी छाती के समक्ष लाकर देवी के सामने खडे हों ।

ई. चैतन्य मिलने एवं आध्यात्मिक उन्नति हेतु देवी से भावपूर्वक प्रार्थना करें । इससे देवीतत्त्व के जागृत होने में सहायता मिलती है ।

उ. आंचलभराई की सामग्री को देवी के चरणों में अर्पित करने के उपरांत उस पर चावल चढाएं ।

उ. देवी को अर्पित की गई साडी संभव हो, तो परिधान करें तथा नारियल की मलई प्रसाद रूप में ग्रहण करें ।

देवी के प्रति भाव जितना अधिक होगा, उतने अधिक काल तक पूजाविधि से प्राप्त सात्त्विकता के टिके रहने में सहायता मिलेगी ।

*कुमकुमार्चन कैसे करें ?*

१ अ. पद्धति १
‘देवी का नामजप करते हुए एक चुटकी भर कुमकुम (रोली), देवी के चरणों से आरंभ कर देवी के सिरतक चढाएं अथवा देवी का नामजप करते हुए उन्हें कुमकुम से आच्छादित करें ।’

१ आ. पद्धति २
कुछ स्थानों पर देवी को कुमकुमार्चन करते समय कुमकुम केवल चरणों पर अर्पित किया जाता है ।

*२. देवीकी मूर्तिपर कुमकुमार्चन करनेका शास्त्रीय आधार*

‘मूल कार्यरत शक्तितत्त्व की निर्मिति लाल रंग के प्रकाश से हुई है, इस कारण शक्तितत्त्व के दर्शक के रूप में देवी की पूजा कुमकुम से करते हैं । कुमकुम से प्रक्षेपित गंध-तरंगों की सुगंध की ओर ब्रह्मांडांतर्गत शक्तितत्त्व की तरंगें अल्प कालावधि में आकृष्ट होती हैं, इसलिए मूर्ति में सगुण तत्त्व को जागृत करने हेतु लाल रंग के दर्शक तथा देवीतत्त्व को प्रसन्न करनेवाली गंध-तरंगों के प्रतीक के रूप में कुमकुम-उपचार को देवीपूजनमें अग्रगण्य स्थान दिया गया है । मूल शक्तितत्त्व के बीज का गंध भी कुमकुम से फैलनेवाली सुगंध से साधर्म्य दर्शाता है, इसलिए देवी को जागृत करने हेतु कुमकुम के प्रभावी माध्यम का प्रयोग किया जाता है ।’ कुमकुम में शक्ति तत्व आकर्षित करने की क्षमता अधिक होती है; इसलिए देवी की मूर्ति को कुमकुमार्चन करने के उपरांत वह जागृत होती है । जागृत मूर्ति का शक्ति तत्त्व कुमकुम में आता है । तदुपरांत जब हम वह कुमकुम लगाते हैं, तो उसकी शक्ति हमें मिलती है

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