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ट्रैफिक चेकपोस्ट वीडियो पर ‘जेल’ चेतावनी का विवाद प्रत्यायुक्त विधान समिति तक पहुँचा मामला, वैधानिकता पर गंभीर सवाल उठाते हुए भाजपा नेता अंकित आनंद ने लिखा

पुलिस के कथित आदेश की संवैधानिकता और वैधानिकता की जांच की मांग 🔴 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघन का आरोप, स्पष्ट कानूनी आधार बताने की मांग

ट्रैफिक चेकपोस्ट वीडियो पर ‘जेल’ चेतावनी का विवाद प्रत्यायुक्त विधान समिति तक पहुँचा मामला, वैधानिकता पर गंभीर सवाल उठाते हुए भाजपा नेता अंकित आनंद ने लिखा

🔴 पुलिस के कथित आदेश की संवैधानिकता और वैधानिकता की जांच की मांग
🔴 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघन का आरोप, स्पष्ट कानूनी आधार बताने की मांग

जमशेदपुर- जमशेदपुर में ट्रैफिक पुलिस चेकपोस्ट के वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल करने पर कार्रवाई और जेल की चेतावनी से जुड़ा मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। इस मुद्दे को लेकर भाजपा के पूर्व जिला प्रवक्ता सह व्हिसलब्लोअर एवं आरटीआई कार्यकर्ता अंकित आनंद ने झारखंड विधानसभा की प्रत्यायुक्त विधान समिति के सभापति को आवेदन भेजकर पूरे प्रकरण की जांच और स्पष्ट दिशा-निर्देश की मांग की है। पत्र की प्रतिलिपि मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, डीजीपी समेत जिले के एसएसपी को भी ईमेल द्वारा भेजी गई है।

आवेदन में भाजपा नेता ने बताया है कि 20 अप्रैल 2026 को प्रकाशित एक स्थानीय दैनिक के समाचार में ट्रैफिक डीएसपी के बयान के आधार पर यह संकेत दिया गया कि पुलिस चेकिंग प्वाइंट का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा करने पर संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई, यहां तक कि कारावास हो सकता है।

इस पर सवाल उठाते हुए अंकित आनंद ने पूछा है कि क्या ऐसा कोई आदेश राज्य सरकार द्वारा विधिवत अधिसूचित किया गया है और यदि हां, तो उसका स्पष्ट कानूनी आधार क्या है। उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि क्या यह निर्देश भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं है।

आवेदन में आगे मांग की गई है कि यदि वीडियो बनाना या साझा करना अपराध की श्रेणी में आता है, तो इसके लिए भारतीय दंड संहिता, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम या अन्य प्रासंगिक कानूनों की कौन-कौन सी धाराएं लागू होती हैं, इसका स्पष्ट विवरण सार्वजनिक किया जाए। साथ ही यह भी पूछा गया है कि क्या यह आदेश प्रत्यायुक्त विधान के अंतर्गत आता है और क्या इसे विधिवत रूप से विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।

अंत में उन्होंने समिति से आग्रह किया है कि यदि यह आदेश विधिक रूप से निराधार पाया जाता है, तो राज्य सरकार एवं संबंधित अधिकारियों को इसका तत्काल खंडन करने का निर्देश दिया जाए, ताकि आम जनता के मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।

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