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मानगो के 10 सरकारी स्कूलों के 150 विद्यार्थियों ने किया दलमा वन्यजीव अभयारण्य का शैक्षिक भ्रमण, नन्हे बादल हाथी से मिलकर बच्चे हुए रोमांचक

जमशेदपुर वन विभाग और गीता थिएटर जमशेदपुर की अनूठी पहल, बच्चों को प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के प्रति किया गया जागरूक निःशुल्क समर कैंप के तहत बच्चों ने पाठ्यपुस्तकों और मोबाइल से दूर, वास्तविक रूप से जाना वनों और वन्यजीवों का महत्व

मानगो के 10 सरकारी स्कूलों के 150 विद्यार्थियों ने किया दलमा वन्यजीव अभयारण्य का शैक्षिक भ्रमण, नन्हे बादल हाथी से मिलकर बच्चे हुए रोमांचक

जमशेदपुर वन विभाग और गीता थिएटर जमशेदपुर की अनूठी पहल, बच्चों को प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के प्रति किया गया जागरूक

निःशुल्क समर कैंप के तहत बच्चों ने पाठ्यपुस्तकों और मोबाइल से दूर, वास्तविक रूप से जाना वनों और वन्यजीवों का महत्व
जमशेदपुर- वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, झारखंड सरकार के तत्वावधान में जमशेदपुर वन प्रमंडल तथा गीता थिएटर, जमशेदपुर के संयुक्त सहयोग से एक विशेष शैक्षणिक व पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसके तहत मानगो क्षेत्र के 10 विभिन्न सरकारी विद्यालयों के लगभग 150 छात्र-छात्राओं को दलमा वन्यजीव अभयारण्य (दलमा भ्रमण) का नि:शुल्क दौरा कराया गया।

यह पहल मुख्य रूप से निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए आयोजित किए जा रहे विशेष नि:शुल्क समर कैंप का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। भ्रमण का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान और मोबाइल की दुनिया से बाहर निकालकर प्रकृति के करीब लाना और उन्हें वास्तविक रूप से वनों, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन तथा वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील बनाना था।

•प्रकृति के बीच व्यावहारिक शिक्षा-
दलमा भ्रमण के दौरान वन विभाग के अधिकारियों एवं गाइडों द्वारा बच्चों को दलमा की समृद्ध वनस्पतियों, पेड़-पौधों और वहां निवास करने वाले पशु-पक्षियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। बच्चों ने बेहद उत्साह के साथ प्राकृतिक वातावरण का अनुभव किया और यह सीखा कि कैसे जंगल और वन्यजीव वैश्विक पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम) को संतुलित रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

•अधिकारियों के वक्तव्य-
इस सराहनीय पहल पर बात करते हुए जमशेदपुर वन प्रमंडल के पदाधिकारी (DFO) सबा आलम अंसारी ने कहा, विश्व पर्यावरण दिवस सप्ताहिक कार्यक्रम के तहत जमशेदपुर वन प्रमंडल विभाग 05 जून तक पर्यावरण संरक्षण जागरूकता अभियान के अंर्तगत विभिन्न कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं यह भी उसका एक हिस्सा था
“हमारा उद्देश्य यही था कि बच्चे प्रकृति को केवल किताबों में न पढ़ें, बल्कि उसे करीब से महसूस करें। जब बच्चे स्वयं वनों और वन्यजीवों के महत्व को समझेंगे, तभी उनके मन में संरक्षण की भावना जागृत होगी और हमारा कल सुरक्षित हो सकेगा। गीता थिएटर और उनकी सहयोगी संस्थाओं ने इस आयोजन को सफल बनाने में बेहतरीन योगदान दिया है।”

गीता थिएटर फाउंडर गीता कुमारी ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ इस समर कैंप के माध्यम से बच्चों को नशापान जैसी सामाजिक बुराइयों से दूर रहने और व्यक्तित्व विकास (पर्सनालिटी डेवलपमेंट) के लिए भी जागरूक किया जा रहा है।
वहीं सचिव प्रेम दीक्षित ने बताया कि मानगो नगर निगम क्षेत्र अंतर्गत यह पहला ऐसा कार्यक्रम आयोजित हुआ है जिसमें सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थीयों को प्रमुखता से प्रथामिकता दिया गया हो, ऐसे तो 2015 से लभतार गीता थिएटर राज्य- जिला के विभिन्न सरकारी विभाग के लिए नुक्कड़ नाटक आयोजित किया है और हर वर्ष नि:शुल्क समर कैंप आयोजित करती रही है पर पहली बार किसी सरकारी विभाग ने इतना आगे आकर सहयोग किया है जिसके लिए गीता थिएटर की पूरी कला नाट्य ट्रस्ट जमशेदपुर वन प्रमंडल विभाग एवं पदाधिकारी श्री सबा आलम अंसारी का तहे दिल से आभार व्यक्त करते हैं।
सरकारी विद्यालयों के बच्चें निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आते हैं जहां समर कैंप और दलमा भ्रमण जैसा कुछ होना सपना बनकर रहा जाता है पर यह सपना गीता थिएटर हर वर्ष सैकड़ों बच्चो की पूरा करती है।

•उत्साहजनक रहा बच्चों का अनुभव-
पहली बार दलमा अभयारण्य का भ्रमण करने वाले स्कूली बच्चों के चेहरे पर एक अलग ही खुशी और रोमांच देखने को मिला जब बच्चे दलमा वन्यजीव अभयारण्य के नन्हे बादल हाथी से मिले, बच्चों ने अपने हाथों से नन्हे बादल हाथी को केला खिलाया और उसे नहाते देखा जिसके बाद दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी संग्रहणालय पहूंचे बच्चे जहां बच्चो ने दलमा के वन्यजीव, प्राणी एवं झारखंड के आदिवासी समुदाय के बारे बहुत करीब से जाना!

अंत में विद्यार्थियों ने पर्यावरण,वन्यजीव संरक्षण एवं वनों की रक्षा करने तथा अधिक से अधिक पौधे लगाने, सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग ना करने का संकल्प भी लिया।

कार्यक्रम को सफल बनाने में सुंदरम, संपूर्ण आश्रय, आरंभ और व्यक्तित्व विकास संस्थान जैसी सहयोगी संस्थाओं के सदस्यों सहित संबंधित स्कूलों के प्रधानाचार्य, शिक्षकों और वन कर्मियों की सक्रिय भूमिका रही।

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