सोना देवी विश्वविद्यालय में डांडिया उत्सव की धूम, परंपरा और उल्लास के रंगों से जगमगाया परिसर; एकता, सदभाव और सांस्कृतिक गौरव का दिया संदेश
नवरात्रि की पावन बेला, डांडिया की गूंजती थाप, पारंपरिक परिधानों की मनमोहक छटा और उल्लास से भरे वातावरण के बीच सोना देवी विश्वविद्यालय, घाटशिला का परिसर भारतीय संस्कृति के रंगों से सराबोर हो उठा। विश्वविद्यालय के विवेकानंद सभागार में आयोजित भव्य डांडिया उत्सव ने परंपरा, उमंग और सांस्कृतिक गौरव का ऐसा मनोहारी दृश्य प्रस्तुत किया, जिसमें लोकसंस्कृति की जीवंतता के साथ एकता, अपनत्व और सामूहिक सहभागिता की भावना भी मुखर हुई

सोना देवी विश्वविद्यालय में डांडिया उत्सव की धूम, परंपरा और उल्लास के रंगों से जगमगाया परिसर; एकता, सदभाव और सांस्कृतिक गौरव का दिया संदेश

घाटशिला- नवरात्रि की पावन बेला, डांडिया की गूंजती थाप, पारंपरिक परिधानों की मनमोहक छटा और उल्लास से भरे वातावरण के बीच सोना देवी विश्वविद्यालय, घाटशिला का परिसर भारतीय संस्कृति के रंगों से सराबोर हो उठा। विश्वविद्यालय के विवेकानंद सभागार में आयोजित भव्य डांडिया उत्सव ने परंपरा, उमंग और सांस्कृतिक गौरव का ऐसा मनोहारी दृश्य प्रस्तुत किया, जिसमें लोकसंस्कृति की जीवंतता के साथ एकता, अपनत्व और सामूहिक सहभागिता की भावना भी मुखर हुई।

यह उत्सव केवल नृत्य और संगीत का आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत, सामाजिक समरसता और विविधता में एकता के मूल्यों का उत्सव बना। डांडिया की हर थाप के साथ उमंग की लहर, हर कदम के साथ परंपरा की झलक और हर मुस्कान में आपसी जुड़ाव का भाव दिखाई दिया। आयोजन ने यह संदेश दिया कि जब विभिन्न विचार, व्यक्तित्व और संस्कृतियां एक साझा मंच पर मिलती हैं, तब एकता की ऐसी सुंदर तस्वीर उभरती है, जो समाज को जोड़ने की शक्ति रखती है।
संस्कृति की थाप पर एकजुट हुआ विश्वविद्यालय परिवार
भारतीय संस्कृति की पहचान उसकी विविधता, उदारता और सभी को साथ लेकर चलने की परंपरा में निहित है। डांडिया इसी सांस्कृतिक विरासत का सजीव प्रतीक है, जो संगीत, नृत्य और सामूहिक उत्सव के माध्यम से लोगों को एक सूत्र में पिरोता है। नवरात्रि के पावन अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने, परंपराओं को आत्मसात करने और भारतीय विरासत के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर प्रदान किया।
पारंपरिक वेशभूषा, संगीत की मधुर लय और उत्साहपूर्ण वातावरण ने पूरे सभागार को उत्सवमय बना दिया। कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि इसने संस्कृति को केवल अतीत की धरोहर के रूप में नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी को जोड़ने और भविष्य के लिए सांस्कृतिक चेतना विकसित करने वाली जीवंत शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया।
सहायक कुलसचिव श्रीमती अर्चना सिंह के नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में आयोजित हुआ उत्सव
इस भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का संचालन एवं नेतृत्व विश्वविद्यालय की सहायक कुलसचिव अर्चना सिंह के मार्गदर्शन में हुआ। उनके नेतृत्व में आयोजित इस उत्सव ने विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक गतिविधियों को नई ऊर्जा प्रदान की तथा विद्यार्थियों के शैक्षणिक विकास के साथ उनके रचनात्मक और सांस्कृतिक विकास के महत्व को भी रेखांकित किया।
इस अवसर पर सहायक कुलसचिव अर्चना सिंह ने कहा “विश्वविद्यालय का दायित्व केवल विद्यार्थियों को शैक्षणिक ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि उन्हें संस्कारों, जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना से समृद्ध बनाना भी है। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को अपनी परंपराओं से जोड़ने के साथ उनमें आत्मविश्वास, सहयोग, अनुशासन और सामूहिक सहभागिता की भावना विकसित करते हैं। हमारी सांस्कृतिक विविधता ही हमारी शक्ति है और इसे सहेजना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।
कुलसचिव डॉ. नीत नयना ने सांस्कृतिक समन्वय को बताया सामाजिक एकता का आधार
कुलसचिव डॉ. नीत नयना ने कहा कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां विविधताओं के बीच भी एकता और आत्मीयता का भाव बना रहता है। डांडिया उत्सव जैसे आयोजन विद्यार्थियों को एक-दूसरे की परंपराओं को समझने, उनका सम्मान करने और आपसी सौहार्द को मजबूत बनाने का अवसर प्रदान करते हैं। शिक्षा के साथ सांस्कृतिक मूल्यों का समन्वय विद्यार्थियों को संवेदनशील, जिम्मेदार और संस्कारवान नागरिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कुलपति प्रोफेसर डॉ. ब्रज मोहन पाट पिंगुवा ने शिक्षा और संस्कृति के समन्वय पर दिया बल
कुलपति प्रोफेसर डॉ. ब्रज मोहन पाट पिंगुवा ने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना है, जिसमें विवेक, संवेदनशीलता संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी का समावेश हो। सांस्कृतिक आयोजन विद्यार्थियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने, अपनी प्रतिभा को अभिव्यक्त करने और समाज की विविधताओं का सम्मान करने की प्रेरणा देते हैं। सोना देवी विश्वविद्यालय विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ सांस्कृतिक एवं रचनात्मक गतिविधियों को भी विशेष महत्व देता है।
कुलाधिपति प्रभाकर सिंह ने युवाओं से सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का किया आहवान
कुलाधिपति प्रभाकर सिंह ने प्रेरित करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति हमारी पहचान है, हमारी परंपराएं हमारी अमूल्य धरोहर हैं और हमारी एकता हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। आज के युवाओं को आधुनिक ज्ञान, नवाचार और प्रगति के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़े रहना चाहिए। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी में अपनी विरासत के प्रति गर्व, दूसरों की परंपराओं के प्रति सम्मान और समाज के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करते हैं। सांस्कृतिक मूल्यों से समृद्ध युवा ही एक सशक्त, समरस और प्रगतिशील समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
नवरात्रि की पावन ऊर्जा से गूंजा एकता और सदभाव का संदेश
नवरात्रि शक्ति, आस्था, सकारात्मक ऊर्जा और नवचेतना का प्रतीक है। इसी पावन भावना से प्रेरित डांडिया उत्सव ने यह संदेश दिया कि संस्कृति केवल उत्सव मनाने तक सीमित नहीं, बल्कि यह लोगों के हृदय को जोड़ने, आपसी विश्वास को मजबूत करने और सामाजिक सद्भाव को नई दिशा देने का माध्यम है।
सोना देवी विश्वविद्यालय का यह आयोजन भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, विद्यार्थियों की प्रतिभा के संवर्धन और परिसर में सौहार्दपूर्ण वातावरण के निर्माण की दिशा में एक सार्थक पहल के रूप में सामने आया। इसने शिक्षा और संस्कृति के सुंदर समन्वय को प्रस्तुत करते हुए यह स्पष्ट किया कि किसी भी शिक्षण संस्थान की वास्तविक उपलब्धि केवल शैक्षणिक सफलता में नहीं, बल्कि ऐसे जागरूक, संस्कारवान और संवेदनशील युवाओं के निर्माण में भी निहित है, जो अपनी परंपराओं का सम्मान करते हुए समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान दें।
डांडिया की थाप पर गूंजते उल्लास और परंपरा के रंगों के बीच सोना देवी विश्वविद्यालय का परिसर एकता, अपनत्व और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बन गया। यह उत्सव अपने पीछे केवल यादगार क्षण ही नहीं, बल्कि एक ऐसा संदेश भी छोड़ गया कि जब संस्कृति दिलों को जोड़ती है, तब विविधता उत्सव बन जाती है और एकता समाज की सबसे बड़ी ताकत।
एक ताल, अनेक दिल, विविध रंग और एक उत्सव—यही भारतीय संस्कृति की आत्मा, हमारी एकता की पहचान और सोना देवी विश्वविद्यालय का गौरवपूर्ण संदेश है।



