Welcome to न्यू झारखण्ड वाणी   Click to listen highlighted text! Welcome to न्यू झारखण्ड वाणी
Uncategorized

शिक्षा के लिए संघर्ष बना राष्ट्रीय संकट – धर्मेंद्र कुमार

देश में वर्ष 2009 में 'शिक्षा का अधिकार' (RTE) कानून पारित किया गया, जिसका उद्देश्य हर बच्चे को सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी देना था। इस ऐतिहासिक कदम के डेढ़ दशक बाद भी देश की वास्तविक स्थिति इस कानून के दावों के ठीक विपरीत नजर आती है। आज देश की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस युवा पीढ़ी को क्लासरूम में बैठकर राष्ट्र निर्माण का खाका तैयार करना चाहिए था, उसे बुनियादी शिक्षा और कदाचार मुक्त परीक्षाओं के लिए सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। परीक्षाओं की शुचिता का खत्म होना और छात्रों का यह आक्रोश केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर करता है। व्यवस्था पर सवाल

शिक्षा के लिए संघर्ष बना राष्ट्रीय संकट – धर्मेंद्र कुमार

देश में वर्ष 2009 में ‘शिक्षा का अधिकार’ (RTE) कानून पारित किया गया, जिसका उद्देश्य हर बच्चे को सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी देना था। इस ऐतिहासिक कदम के डेढ़ दशक बाद भी देश की वास्तविक स्थिति इस कानून के दावों के ठीक विपरीत नजर आती है। आज देश की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस युवा पीढ़ी को क्लासरूम में बैठकर राष्ट्र निर्माण का खाका तैयार करना चाहिए था, उसे बुनियादी शिक्षा और कदाचार मुक्त परीक्षाओं के लिए सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। परीक्षाओं की शुचिता का खत्म होना और छात्रों का यह आक्रोश केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर करता है।
व्यवस्था पर सवाल

हाल के वर्षों में देश की प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर बोर्ड परीक्षाओं तक में पेपर लीक, धांधली और भ्रष्टाचार के मामलों की बाढ़ आ गई हैं। जब देश की सबसे बड़ी केंद्रीय जांच एजेंसियां मेडिकल और प्रशासनिक सेवाओं जैसी शीर्ष परीक्षाओं में हुए घोटालों की जांच करने में व्यस्त हों, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा तंत्र में दीमक लग चुका है। महीनों तक दिन-रात एक करके तैयारी करने वाले ईमानदार छात्रों के भविष्य पर जब चंद माफिया और भ्रष्ट अधिकारी पानी फेर देते हैं, तो युवाओं का व्यवस्था पर से भरोसा उठना स्वाभाविक है। यह स्थिति तब और अधिक गंभीर हो जाती है जब न्याय की गुहार लगाने वाले छात्रों पर लाठियां बरसाई जाती हैं। इन समस्याओं की जड़ें हमारे लचर कानूनी और तकनीकी ढांचे में छिपी हैं। पेपर लीक के पीछे एक पूरा संगठित सिंडिकेट काम कर रहा है, जो प्रिंटिंग प्रेस से लेकर परीक्षा केंद्रों तक अपनी पहुंच रखता है। आधुनिक तकनीक के इस दौर में जहां हम डिजिटल इंडिया और तकनीकी क्रांति का जश्न मना रहे हैं, वहीं हमारी परीक्षा एजेंसियां एक सुरक्षित और फुलप्रूफ ऑनलाइन या ऑफलाइन परीक्षा आयोजित कराने में नाकाम साबित हो रही हैं। यह सरकार फुलप्रूफ चुनाव कराने का दावा तो करती है लेकिन फुलप्रूफ परीक्षा कराने में असमर्थ है। इसके अलावा, मौजूदा कानून और सजा के प्रावधान इतने कमजोर रहे हैं कि शिक्षा माफियाओं के मन में कानून का कोई खौफ नहीं बचा है। हालांकि, कड़े कानूनों की प घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन उनका जमीन पर कड़ाई से लागू न होना इस समस्या को और बढ़ाता है।

प्रभाव चिंताजनक

इस विडंबना का सबसे गहरा सामाजिक और आर्थिक प्रभाव देश के गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर पड़ता है। एक आम परिवार अपनी पूरी जमा-पूंजी अपने बच्चे की कोचिंग और पढ़ाई में झोंक देता है। जब परीक्षा निरस्त होती है या उसमें धांधली सामने आती है, तो केवल एक परीक्षा रद्द नहीं होती, बल्कि उस परिवार की उम्मीदें, समय और आर्थिक संसाधन भी हमेशा के लिए मटियामेट हो जाते हैं। यह स्थिति देश में मानसिक तनाव और अवसाद को बढ़ा रही है, जिसके गंभीर परिणाम भी सामने आए हैं। लगभग दो दर्जन बच्चे पेपर लीक के इस सदमें को बर्दाश्त नहीं कर पाए और मौत को गले लगा लिया। यह किसी भी प्रगतिशील समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। यदि हमें इस राष्ट्रीय संकट से उबरना है, तो खोखले वादों और तात्कालिक सुधारों से आगे बढ़ना होगा। सरकार को परीक्षा प्रणालियों में आमूलचूल बदलाव करते हुए पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना होगा। प्रश्नपत्रों की छपाई से लेकर उनके वितरण तक में न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप (Zero-Human-Intervention) और उन्नत तकनीक का उपयोग अनिवार्य किया जाना चाहिए। साथ ही, पेपर लीक में संलिप्त अपराधियों और उनके संरक्षकों के खिलाफ फास्ट-ट्रैक कोर्ट के जरिए ऐसी कठोर और त्वरित सजा तय होनी चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने। शिक्षा का अधिकार केवल कागजों पर मुफ्त दाखिला देने तक सीमित नहीं हो सकता। इसका वास्तविक अर्थ एक ऐसा सुरक्षित और पारदर्शी माहौल देना है जहां हर छात्र की प्रतिभा के साथ न्याय हो सके। देश के युवाओं को सड़कों से वापस क्लासरूम और लाइब्रेरी में भेजने के लिए सरकार, न्यायपालिका और समाज को मिलकर इच्छाशक्ति दिखानी होगी, अन्यथा ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (जनसांख्यिकीय लाभांश) का हमारा दावा महज एक नारा बनकर रह जाएगा। समाज के सभी वर्ग के लोगों को तमाम मतभेदों को दरकिनार कर इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है और छात्रों को अपना नैतिक समर्थन देना चाहिए। क्योंकि यदि शिक्षा की नींव खोखली रही, तो राष्ट्र निर्माण का सपना केवल नारों में ही सिमट जाएगा

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!
Click to listen highlighted text!