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साहित्यिक संस्था ‘सहयोग’ ने मनाई राष्ट्रकवि दिनकर की 118वीं जयंती

आभासी गोष्ठी में उमड़े देशभर के साहित्यप्रेमी ​ओजस्वी काव्य-पाठ और संस्मरणों के जरिए याद किए गए दिनकर, गद्य-पद्य साहित्य पर विशेषज्ञों ने मंथन किया

साहित्यिक संस्था ‘सहयोग’ ने मनाई राष्ट्रकवि दिनकर की 118वीं जयंती

आभासी गोष्ठी में उमड़े देशभर के साहित्यप्रेमी

​ओजस्वी काव्य-पाठ और संस्मरणों के जरिए याद किए गए दिनकर, गद्य-पद्य साहित्य पर विशेषज्ञों ने मंथन किया

​जमशेदपुर- जमशेदपुर की बहुभाषी साहित्यिक संस्था ‘सहयोग’ की ओर से राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की 118वीं जयंती के उपलक्ष्य में ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ. गूगल मीट पर दो अलग-अलग सत्रों में चले इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकारों ने दिनकर जी की राष्ट्रीय चेतना, ओजस्वी विचारों और मानवीय संवेदनाओं पर विस्तार से चर्चा की. जहाँ पहले सत्र में उनके व्यक्तित्व और गद्य साहित्य पर प्रकाश डाला गया, वहीं दूसरे सत्र में कवियों ने उनकी कालजयी रचनाओं का सस्वर काव्य-पाठ किया.

पारिवारिक यादें: दौहित्री अमृता शर्मा और पूर्व अधिकारी शुभा कुमार ने रखे व्यक्तिगत संस्मरण

संगोष्ठी में दिनकर जी की दौहित्री अमृता शर्मा की विशेष उपस्थिति रही. उन्होंने अपने नाना जी के साथ बिताए बचपन के दिनों को याद करते हुए उनके बेहद आत्मीय, पारिवारिक और मानवीय रूप के साथ-साथ एक कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में उनके जीवन के विविध आयामों को सामने रखा.
​इसके अलावा दिल्ली से जुड़ीं पूर्व प्रशासनिक अधिकारी शुभा कुमार ने भी दिनकर जी से जुड़ी अपनी व्यक्तिगत यादें साझा कीं, जिनसे राष्ट्रकवि के सरल, आत्मीय और प्रभावपूर्ण स्वभाव का पता चलता है.

प्रतिरोध और ओज के मुखर कवि थे दिनकर” — मंजू पांडेय ‘उदिता’

​उत्तर प्रदेश से जुड़ीं मुख्य वक्ता मंजू पांडेय ‘उदिता’ ने दिनकर के साहित्य में निहित राष्ट्रीयता और ऊर्जा पर बात करते हुए प्रमुख बिंदु रखे:

​क्रांतिकारी चेतना: दिनकर जी की लेखनी ने गुलामी के दौर में भारतीयों के भीतर प्रतिरोध की ज्वाला जलाई और युवाओं को राष्ट्र के प्रति समर्पण की प्रेरणा दी.

​परंपरा का संवर्धन: उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा रोपे गए राष्ट्रीय चेतना के पौधे को अपने ओजस्वी साहित्य से एक वटवृक्ष का रूप दिया.

​आदर्श और अध्यात्म: उनकी राष्ट्रीयता केवल राजनीतिक नहीं थी, बल्कि उसमें नैतिक आदर्शों और अध्यात्म का अनूठा समावेश था.

​”आज भी प्रासंगिक हैं दिनकर के विचार” — डॉ. जूही समर्पिता

​अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. जूही समर्पिता ने स्पष्ट किया कि दिनकर जी को केवल ओज और वीर रस तक सीमित रखना उनके साथ न्याय नहीं होगा. वे न्याय, स्वाभिमान, सामाजिक सरोकार और मानवीय मूल्यों के भी उतने ही बड़े पक्षधर थे.

​”दिनकर जी को याद करने का अर्थ है उनके द्वारा स्थापित मानवीय और सामाजिक सरोकारों से जुड़ना. आज के संक्रमण काल में भी उनकी रचनाएँ नई पीढ़ी को सही दिशा दिखाने में पूरी तरह सक्षम हैं.”
— डॉ. जूही समर्पिता (कार्यक्रम अध्यक्षा)

​सरस्वती वंदना के साथ आगाज, काव्य-पाठ से सजा दूसरा सत्र

​कार्यक्रम की शुरुआत श्रीमती प्रणति शरण द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुई. संस्था सचिव डॉ. भारती कुमारी ने अतिथियों का स्वागत किया, डॉ. पुष्पा कुमारी ने गोष्ठी की रूपरेखा रखी और संचालन डॉ. संध्या सिन्हा ने किया.
​द्वितीय सत्र में दिनकर जी की कृतियों और उनकी चेतना पर आधारित काव्य-पाठ हुआ. इसमें रचनाएँ प्रस्तुत करने वाले प्रमुख सदस्य:

-​ज्योत्स्ना अस्थाना, विद्या तिवारी, रीना सिन्हा ‘सलोनी’, स्मृति पाण्डेय, लक्ष्मी सिंह ‘रूबी’, पद्मा प्रसाद

-​सुष्मिता मिश्रा, सविता सिंह, पूनम सिंह, स्वाति कुमारी, छाया प्रसाद, सुधा गोयल

-​नीलम पेड़ीवाल, डॉ. संध्या सिन्हा और ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र

​इस आभासी आयोजन का तकनीकी प्रबंधन शालिनी प्रसाद तथा रीना सिन्हा के ज़िम्मे था. अंत में वक्ताओं ने सहमति जताई कि दिनकर का साहित्य न केवल अपने दौर की बुलंद आवाज़ था, बल्कि भारतीय समाज और संस्कृति के लिए आज भी उतना ही प्रासंगिक है

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