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एमजीएम हादसा: मुआवजा नहीं मिला तो हाईकोर्ट की शरण में सौरभ विष्णु

एमजीएम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में 3 मई 2025 को हुए छत हादसे के पीड़ित परिवारों को 15 महीने से अधिक समय बाद भी घोषित मुआवजा नहीं मिलने का मामला अब झारखंड उच्च न्यायालय पहुंच गया है। सौरभ विष्णु, अध्यक्ष जन विकास मंच एवं पूर्व विधानसभा प्रत्याशी, ने अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा के माध्यम से उच्च न्यायालय, रांची में जनहित याचिका दायर कर न्यायालय को पूरी स्थिति से अवगत कराया है (दिनांक 16 सितंबर 2026)। इस हादसे में डेविड जॉनसन, लुकास साइमन तिर्की, श्रीचंद तांती एवं रेणुका देवी की मृत्यु हुई थी

एमजीएम हादसा मुआवजा नहीं मिला तो हाईकोर्ट की शरण में सौरभ विष्णु

जमशेदपुर- एमजीएम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में 3 मई 2025 को हुए छत हादसे के पीड़ित परिवारों को 15 महीने से अधिक समय बाद भी घोषित मुआवजा नहीं मिलने का मामला अब झारखंड उच्च न्यायालय पहुंच गया है। सौरभ विष्णु, अध्यक्ष जन विकास मंच एवं पूर्व विधानसभा प्रत्याशी, ने अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा के माध्यम से उच्च न्यायालय, रांची में जनहित याचिका दायर कर न्यायालय को पूरी स्थिति से अवगत कराया है (दिनांक 16 सितंबर 2026)। इस हादसे में डेविड जॉनसन, लुकास साइमन तिर्की, श्रीचंद तांती एवं रेणुका देवी की मृत्यु हुई थी।

सौरभ विष्णु ने न्यायालय को बताया कि राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों को ₹5 लाख तथा प्रत्येक घायल को ₹50,000 देने की सार्वजनिक घोषणा की थी, लेकिन याचिका दायर होने तक 15 महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद परिवारों को भुगतान नहीं हुआ। एमजीएम अस्पताल ने स्वयं 31 अगस्त 2026 को सूचना के अधिकार के तहत दिए उत्तर में माना था कि भुगतान की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। यह उत्तर याचिका के साथ न्यायालय के समक्ष रखा गया है।

याचिका में न्यायालय को बताया गया है कि सरकार की सार्वजनिक घोषणा से परिवारों में वैध अपेक्षा उत्पन्न होती है, जिसे पूरा करना राज्य का बाध्यकारी दायित्व है। घोषित राशि को 15 महीने तक रोके रखना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन और “संवैधानिक अपकृत्य” है। सौरभ विष्णु ने न्यायालय के समक्ष यह भी रखा कि शोकाकुल परिवारों को घोषित सहायता के लिए महीनों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगवाना मानसिक उत्पीड़न और प्रशासनिक क्रूरता है, जो दोषी तंत्र के विरुद्ध दंडात्मक क्षतिपूर्ति का आधार बनता है।

इन तथ्यों के आधार पर याचिका में न्यायालय से प्रार्थना की गई है कि मुआवजा वितरण में हुई घोर प्रशासनिक देरी और संवेदनहीनता के लिए जिम्मेदारी तय की जाए, राज्य के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों एवं अस्पतालों का किसी स्वतंत्र एजेंसी से संरचनात्मक एवं अग्नि सुरक्षा ऑडिट कराकर उन्हें जनता के उपयोग हेतु सुरक्षित प्रमाणित किया जाए, तथा अनुच्छेद 21 के तहत अस्पतालों में जीवन-सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित हो। साथ ही न्यायालय से आग्रह किया गया है कि मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों में पूर्ण न्याय के लिए वह जो भी उचित आदेश आवश्यक समझे, पारित करे।

याचिका में राज्य सरकार, मुख्य सचिव, स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग, भवन निर्माण विभाग, उपायुक्त पूर्वी सिंहभूम, एमजीएम अस्पताल के अधीक्षक तथा सिविल सर्जन, पूर्वी सिंहभूम को प्रतिवादी बनाया गया है।
सौरभ विष्णु ने कहा, “चार परिवारों ने एक सरकारी अस्पताल में अपने प्रियजन खोए, और उसके बाद उन्हें घोषित सहायता के लिए भी महीनों भटकना पड़ा। हमने न्यायालय के सामने यह पूरी स्थिति रखी है। हमारी पहली प्राथमिकता यही है कि परिवारों को उनका हक जल्द मिले, और राज्य के किसी भी सरकारी अस्पताल में ऐसा हादसा दोबारा न हो। यह याचिका किसी व्यक्ति या दल के विरुद्ध नहीं है। मामला अब न्यायालय के समक्ष है और हमें न्यायालय पर पूरा भरोसा है।

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