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बंगाल में बदलाव या बदले की राजनीति? – धर्मेंद्र कुमार

पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि यदि प्रदेश में भाजपा की सरकार बनती है तो “बदलाव की राजनीति” होगी। जनता ने इस वादे पर भरोसा कर भाजपा को सत्ता सौंपी। लेकिन सत्ता मिलने के बाद से राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से जो घटनाएं सामने आ रही हैं। वे ना सिर्फ इस भरोसे को झकझोर रही हैं बल्कि प्रदेश में ध्वस्त कानून व्यवस्था की भयानक तस्वीर पेश कर रही है। जो चिंताजनक है

बंगाल में बदलाव या बदले की राजनीति? – धर्मेंद्र कुमार

पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि यदि प्रदेश में भाजपा की सरकार बनती है तो “बदलाव की राजनीति” होगी। जनता ने इस वादे पर भरोसा कर भाजपा को सत्ता सौंपी। लेकिन सत्ता मिलने के बाद से राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से जो घटनाएं सामने आ रही हैं। वे ना सिर्फ इस भरोसे को झकझोर रही हैं बल्कि प्रदेश में ध्वस्त कानून व्यवस्था की भयानक तस्वीर पेश कर रही है। जो चिंताजनक है।

प्रदेश में जारी है हिंसा का दौर

विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से ही बंगाल में लगातार टीएमसी कार्यकर्ताओं, नेताओं और सांसदों पर हमले हो रहे हैं। हाल ही में एक सफ्ताह के अंदर पहले पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और फिर सांसद कल्याण बनर्जी पर भीड़ द्वारा हमले किए गए। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन हमलों को लेकर सरकार द्वारा कोई अफसोस तक व्यक्त नहीं किया गया और ना ही घटना कै दौरान उपस्थित पुलिस के जवानों के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई। सासंद की सुरक्षा की जिम्मेवारी राज्य सरकार की होती है। लेकिन सरकार द्वारा इन घटनाओं को गंभीरता से नहीं लिया जाना लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है। प्राप्त जानकारी के अनुसार टीएमसी कार्यकर्ताओं को धमकाया जा रहा है, कई जगहों पर कार्यालयों पर हमले हुए हैं। चुनाव बाद दर्ज की गई घटनाओं में सैकड़ों कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और दर्जनों हमले शामिल हैं। विपक्ष का आरोप है कि यह सब एक “सोची-समझी रणनीति” का हिस्सा है।

बदले की राजनीति के संकेत

बंगाल में जिस प्रकार एक तरफा हिंसक घटनाएं हो रहीं हैं, जिसमें राज्य प्रशासन की भूमिका भी संदिग्ध लगती है। विपक्ष का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन भाजपा के इशारे पर काम कर रही हैं और हिंसा रोकने के बजाय उसे बढ़ावा दिया जा रहा हैं। इन घटनाओं पर केंद्र और राज्य सरकारों की चुप्पी उनके रणनीति का हिस्सा है। जिससे असामाजिक तत्वों को खुली छूट मिल गई है। लोकतंत्र में सांसदों पर भीड़तंत्र द्वारा हमला होना केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सीधा हमला है।

कानून-व्यवस्था पर सवाल
ऐसा प्रतित हो रहा है कि बंगाल में कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमराई गई है। हिंसा रोकने में राज्य सरकार की विफलता यह संकेत देती है कि प्रशासन या तो अक्षम है या फिर जानबूझकर असमाजिक तत्वों को मौन समर्थन दे रहा है। विपक्ष का कहना है कि यह “राजनीतिक प्रतिशोध” है, जबकि जनता बदलाव की उम्मीद कर रही थी।
बंगाल में भाजपा की जीत को जनता ने बदलाव की उम्मीद से देखा था। लेकिन घटनाएं यह बताती हैं कि यहां बदलाव नहीं बल्कि बदले की राजनीति चल रही है। यदि सरकार सचमुच बदलाव चाहती है तो उसे कानून का राज स्थापित करना होगा, हिंसा करने वालों पर कठोर कार्रवाई करनी होगी, और विपक्ष को लोकतंत्र का हिस्सा मानकर राजनीतिक सहिष्णुता दिखानी होगी। अन्यथा बंगाल की राजनीति केवल झंडा बदलने तक सीमित रहेगी, जबकि डंडा और गुंडा वही रहेंगे।

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