संपूर्ण भोजपुरी विकास मंच ने ओल्ड ऐज होम में होली मनाई,पकवान और फल बांटे
हरेक वर्ष की भांति इस वर्ष भी संपूर्ण भोजपुरी विकास मंच के सदस्यों द्वारा साकची के बाराद्वारी स्थित ओल्ड ऐज होम में बुजुर्गो बूढ़े माता पिता स्वरूप लोगों के साथ अबीर का गुलाल लगाकर,घर का बना पकवान,फल आदि देकर मनाया

जमशेदपुर- संपूर्ण भोजपुरी विकास मंच ने ओल्ड ऐज होम में होली मनाई,पकवान और फल बांटे

आज हरेक वर्ष की भांति इस वर्ष भी संपूर्ण भोजपुरी विकास मंच के सदस्यों द्वारा साकची के बाराद्वारी स्थित ओल्ड ऐज होम में बुजुर्गो बूढ़े माता पिता स्वरूप लोगों के साथ अबीर का गुलाल लगाकर,घर का बना पकवान,फल आदि देकर मनाया। इस अवसर पर महामंत्री प्रदीप सिंह भोजपुरिया,मुस्कान के अध्यक्ष शशि भूषण मिश्रा,समाजसेवी उमेश पांडेय, टी एस पी डी एल यूनियन के कौशलेश कुमार,राजेश पांडेय,मनोज ठाकुर इत्यादि शामिल हुए।इस अवसर पर महामंत्री प्रदीप सिंह भोजपुरिया ने अपना अनुभव महसूस कर कहा कि कैसे कोई अपने माता पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ देता है

यह सवाल बार-बार दिल को झकझोर देता है.. जिसने हमें जन्म दिया, रातों की नींद त्यागकर पाला जिसके हाथ की रोटी और आशीर्वाद से हम बड़े हुए वही माता पिता एक दिन अकेले कैसे रह जाते हैं
आज वृद्धाश्रम में देखा वैसे तो यथार्थ में मै कितनी ही बार वृद्धाश्रम गया हूँ मांओ और पिता जैसे लोगों के साथ समय गुजारा है उनका आशीष लिया है खाना पीना खिलाने के बहाने उनके दर्द को बांटने की कोशिश की है ढेरों वृद्धाएँ अपने-अपने कोनों में बैठी रहती है कुछ चुप है कुछ आँखों में अधूरी कहानियाँ छुपाए हुई है.. और उन्हीं के बीच एक वृद्धा माँ गाना गाते हुए नाच रही है..
पहली नज़र में लगा जैसे वह बहुत खुश है..लेकिन गहराई से देखा तो वह नृत्य जीवन की पीड़ा छुपाने का एक माध्यम है शायद उस माँ ने सोच लिया है कि यदि दुख बाँटने वाला कोई नहीं है, तो कम से कम गीत ही उसका सहारा बनें..
मन भर आया..सोचने लगी — क्या यही अंजाम होना चाहिए उन माताओं का जिन्होंने पूरी जिंदगी हमारे लिए समर्पित कर दी.. क्या यही है आधुनिकता का मतलब अपने माता-पिता को संस्थानों के हवाले कर देना..माँ का होना ही जीवन का सबसे बड़ा आश्रय है। उनके बिना घर सिर्फ दीवारों का ढांचा है.. माँ की गोद ही वह मंदिर है जिसमें सच्चा सुख बसता है.. और जब वही माँ वृद्धाश्रम में गाना गाकर खुद को संभाल रही हो, तो यह केवल उनका नहीं, बल्कि हमारे समाज का दर्द है..आज ज़रूरत है कि हम यह समझें माँ-बाप किसी बोझ का नाम नहीं हैं..वे हमारी जड़ें हैं.. अगर हम अपनी जड़ों को छोड़ देंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी हमें उसी तरह छोड़ देंगी..
आइए, अपने माता-पिता और बुज़ुर्गों के लिए थोड़ा समय निकालें..एक छोटी मुस्कान, एक गले लगाना, एक साथ बिताया पल — उनके लिए पूरी दुनिया है….प्रदीप सिंह भोजपुरिया,महामंत्री,संपूर्ण भोजपुरी विकास मंच।


