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प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को मिला नया चेयरमैन, लेकिन पत्रकारों की सीटें अब भी खाली

महीनों की अनिश्चितता के बाद प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को आखिरकार नया नेतृत्व मिल गया है। सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई ने 24 अप्रैल 2026 को चेयरमैन पद का कार्यभार संभाल लिया। इससे पहले भी वह 2022 से 2025 तक इस पद पर रह चुके हैं और अब उन्हें दूसरी बार यह जिम्मेदारी सौंपी गई है

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को मिला नया चेयरमैन, लेकिन पत्रकारों की सीटें अब भी खाली

नई दिल्ली- महीनों की अनिश्चितता के बाद प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को आखिरकार नया नेतृत्व मिल गया है। सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई ने 24 अप्रैल 2026 को चेयरमैन पद का कार्यभार संभाल लिया। इससे पहले भी वह 2022 से 2025 तक इस पद पर रह चुके हैं और अब उन्हें दूसरी बार यह जिम्मेदारी सौंपी गई है
हालांकि चेयरमैन की नियुक्ति के बावजूद काउंसिल अभी अधूरी है। कार्यरत पत्रकारों और संपादकों के लिए निर्धारित कई सीटें अब भी खाली पड़ी हैं। 29 सदस्यीय इस वैधानिक संस्था में पेशेवर पत्रकारों के प्रतिनिधित्व के लिए 13 सदस्यों की जरूरत होती है, लेकिन इन पदों पर अब तक नियुक्ति नहीं हो पाई है, जिससे काउंसिल की कार्यक्षमता पर सवाल उठ रहे हैं।
इस मुद्दे को लेकर पहले भी सस्मित पात्रा ने संसद में आवाज उठाई थी और सरकार से काउंसिल को जल्द पूर्ण करने की मांग की थी। उन्होंने कहा था कि एक स्वतंत्र और जवाबदेह मीडिया के लिए प्रेस काउंसिल का पूरी तरह सक्रिय होना जरूरी है, खासकर तब जब यह संस्था दिसंबर 2025 से बिना चेयरमैन के काम कर रही थी।
दरअसल सदस्यों के चयन को लेकर विवाद भी सामने आया है प्रस्तावित बदलाव के तहत ‘वर्किंग जर्नलिस्ट्स की राष्ट्रीय यूनियन’ की बजाय अलग-अलग प्रेस क्लबों से प्रतिनिधि चुनने की बात कही गई थी, जिसका कई पत्रकार संगठनों ने विरोध किया। उनका तर्क है कि प्रेस क्लब स्थानीय स्तर तक सीमित होते हैं और उनमें गैर-पत्रकार सदस्य भी शामिल होते हैं, जिससे पेशेवर पत्रकारों का सही प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता
1965 के अधिनियम के तहत स्थापित और 1978 में पुनर्गठित यह संस्था देश में प्रिंट मीडिया के मानकों की निगरानी करती है। हालांकि, इसके पास दंडात्मक अधिकार सीमित हैं और यह केवल शिकायतों की सुनवाई कर सिफारिशें दे सकती है। डिजिटल मीडिया और टीवी चैनल अभी इसके दायरे में नहीं आते, जबकि इन्हें शामिल करने की मांग लंबे समय से उठ रही है।
ऐसे में चेयरमैन की नियुक्ति से एक अहम कदम जरूर उठाया गया है, लेकिन काउंसिल को पूरी तरह प्रभावी बनाने के लिए सभी खाली पदों को भरना और अधिकारों को मजबूत करना अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

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