लोकगीतों के मंचीय गायन के एक युग का अंत
पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई को शब्दांजलि — संदीप मुरारका

लोकगीतों के मंचीय गायन के एक युग का अंत
पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई को शब्दांजलि
— संदीप मुरारका

पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई
जनजाति : परधान (गोंड)
कला के क्षेत्र में पद्म विभूषण 2019
पद्मभूषण 2003 एवं पद्मश्री 1988
• पंडवानी लोकगीत-नाट्य की विख्यात महिला कलाकार
• महाभारत की कहानियों को विशिष्ट शैली में सुनाने वाली अद्वितीय गायिका
जन्म – 7 सितंबर,1956 (हरतालिका तीज)
निधन – 5 जुलाई, 2026
जन्म स्थान – गनियारी ग्राम, भिलाई, जिला दुर्ग , छत्तीसगढ़
पिता – हुनुकलाल परधा
माता – सुखवती
पति – तुक्का राम
*जीवन परिचय* – देश की सबसे बड़ी अनुसूचित जनजाति गोंड की उपजाति परधान में तीजन का जन्म हुआ. छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध पर्व तीजा के दिन जन्म हुआ, इसलिए इनकी मां ने नाम रख दिया ‘तीजन’ . वे अपने माता-पिता की पांच संतानों में सबसे बड़ी थीं. परिवार चटाइयां और झाडू बुनने का काम करता था, यानी उनकी पारिवारिक आजीविका ‘झाडू’थी
तीजन बारह वर्ष की हुई. नाना के घर गई हुई थी. नाना ब्रजलाल पंडवानी गाते थे. गांव गांव में कार्यक्रम करते थे. कार्यक्रम अमूमन रात्रि में हुआ करते थे. ज्यादातर पुरुष ही दर्शक होते थे. एक रात नाना कार्यक्रम देकर पैदल घर को लौट रहे थे. देखा पीछे पीछे 12 वर्षीय नातिन चली आ रही है. अरे ! तू कहां थी तीजन ? नानाजी आप पंडवानी सुना रहे थे. मैं वहीं मंदिर में बैठी सुन रही थी. नानाजी ने देखा रास्ता भी कट जाएगा, बच्ची से गप्पें भी हो जाएंगी. उन्होनें पूछा – अच्छा तीजन , बताओ तो क्या सुना ?
मानो तीजन इस निमंत्रण के इंतजार में ही थी. शकुनि द्वारा जुए में छल से प्रारंभ होकर, युद्ध की तैयारियां, गीता संदेश, जहर उगलता दुर्योधन, द्रौपदी का स्वाभिमान, अर्जुन की वीरता, दु:शासन का वध, वीर कर्ण व अभिमन्यु की दर्दनाक मौत, भीम की गदा का कमाल, भीम और हनुमान का मिलन आदि आदि. छोटी सी तीजन, मधुर छत्तीसगढ़ी बोली और धाराप्रवाह इतनी कहानियां. नाना ब्रजलाल की आंखे डबडबा गई. उन्हें तीजन के भीतर छिपा हुआ एक कलाकार दिखने लगा.
अब नानाजी अपने झोपड़े में तीजन को पंडवानी गायन सिखाने लगे. उनके पास था महाभारत की कहानियों का कभी ना खत्म होने वाला खजाना. अभी एक माह ही हुए थे. तीजन की मां को पता चला कि तीजन पंडवानी में रुचि ले रही है. भाई बहनों में सबसे बड़ी, ऊपर से लड़की, घर के कामों में हाथ बटाने की बजाए, गाने गाए ! वो भी वर्ष 1968 में! रूढ़िवादी मां तीजन को अपने घर लौटा लाई. और जम कर झाड़ू से पिटाई की. डर से थरथराती तीजन के होंठों से द्रौपदी की गाथा फूट पड़ी. मां का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया. अब शुरू हुआ बालिका तीजन पर यातनाओं का दौर. उसे कमरे में बंद कर दिया जाता. खाना नहीं दिया जाता. ना अक्षर ज्ञान. ना स्कूल. ना खेल का मैदान. आसान नहीं था उनका बचपन. अंततः तेरह साल की उम्र में तीजन ब्याह दी गई.
*योगदान* – तीजन का विवाह हो रहा था. किन्तु वो महाभारत के किस्से गुनगुना रही थी. आखिर बच्ची ही तो थी. उसकी मधुर बोली में पंडवानी बड़ी सुहावनी लगती. आस पास की महिलाएँ मौका पाकर तीजन को पंडवानी गाने को कहती और वे गाया करतीं. यह बात उसके ससुराल वालों को नहीं सुहाती थी. एक बार नजदीक के चंद्रखुरी गांव में पंडवानी का आयोजन था. आयोजकों ने बाल कलाकार तीजन की तारीफें सुन रखी थी. सो निमंत्रण भेज दिया. पर पति ने जाने की अनुमति नहीं दी.
सदैव गौतम ही यशोधरा को नहीं छोड़ जाते, जरूरत पड़ने पर यशोधरा भी बुद्ध की राह पर पति को छोड़ निकल सकती है.
“रात्रि के प्रहर में
छोड़ मोह माया का संसार .
निकल पड़े गौतम
करने बुद्ध जीवन को साकार.”
कुछ ऐसा ही घटित हुआ तीजन के जीवन में. चंद्रखुरी गांव का निमंत्रण मिलने के बाद तीजन मंच पर चढ़ने को बेताब थी. रात का अंधियारा. सोता हुआ पति. तानपुरा लेकर तीजन पति के घर से निकल पड़ी. तानपुरे पर लगे मोरपंख को यूँ पकड़ा मानो कान्हा की अंगुली थाम रखी हो.
पहुँच गई चंद्रखुरी. मंच पर अपना पहला कार्यक्रम देने लगी. दर्शक आवाक हो कर सुन रहे थे. एक नई कलाकार की मीठी आवाज में पंडवानी. फिर अचानक उनका पति वहाँ पहुंच गया और मंच पर चढ़ गया. तीजन के बालों को पकड़ लिया और खींचकर उसे घर ले जाने का प्रयास करने लगा . किन्तु महाभारत की कथा सुना रही तीजन के तानपुरे में अर्जुन के गांडीव और भीम के गदा की शक्ति समा गई. जिसका प्रहार पड़ा उस मूर्ख पति की पीठ पर. भविष्य की ओर अग्रसर तीजन की राह रुक ना पायी. बल्कि आसान हो गई.
चंद्रखुरी गाँव के लोगों ने तीजन को कार्यकम के एवज में एक बोरी चावल दिए. तीजन ने उन्हें बेचकर अपनी अलग झोपड़ी बनवा ली. 14 वर्ष की अल्पायु में तीजन ने अपने रूढ़िवादी पति से संबंध तोड़ लिए. ससुराल के साथ साथ मायके वालों ने भी तीजन से दूरी बना ली. पर मोहल्ले की औरतें मन ही मन तीजन के साहस की तारीफ़ें किया करती. असल में हर औरत तीजन में खुद को ढूंढने लगी. किसी ने तीजन को चावल दिए, तो किसी ने साड़ियाँ, तो किसी ने बर्तन. यूँ शुरू हो गई तीजन की नई गृहस्थी और नई जीवन गाथा.
वर्ष 1976. तीजन पंडवानी गाने लगी. तीजन की ख्याति बढ़ने लगी. वे अठारह दिनों की पंडवानी गाया करती. उसके आयोजन में पाँच हजार से पचास हजार तक दर्शक जुटने लगे. मेले का सा माहौल बन जाया करता. लोग तम्बू लगाकर आयोजन स्थल पर ही 18 -18 दिन टिक जाते. रोज गायन होता. चढ़ावा चढ़ता. तीजन जब लौटती तो उसके साथ तीन चार बैलगाड़ियों में लदे अनाज, कपड़े, बरतन जैसे उपहार और छोली भरकर सिक्के हुआ करते.
तीजन साल में ऐसी तीन – चार पंडवानी करने लगी. जैसे जैसे तीजन समृद्ध होने लगी. वैसे वैसे उसकी खोई हुई रिश्तेदारी लौटने लगी. झाड़ू से पीटने वाली माँ और रिश्ता तोड़ लेने वाले भाई फिर जुटने लगे.
ऐसे ही किसी पंडवानी गायन के कार्यक्रम में भारत के मशहूर पटकथा लेखक, नाटककार एवं कवि हबीब तनवीर ने तीजन के अनूठे प्रदर्शन को देखा. उनकी भाव भंगिमा, छत्तीसगढ़ी बोलने का अंदाज, तानपुरा पकड़ने की स्टाइल एवं मंच पर घूम घूम कर गाने की अदा से तनवीर प्रभावित हुए बिना न रह सके. चूंकि तनवीर स्वयं छत्तीसगढ़ के रहने वाले थे, सो भाषा पर तीजन की पकड़ को उन्होने बखूबी समझा. हबीब तनवीर तीजन को दिल्ली ले गए. वहाँ जिस कार्यक्रम में तीजन ने प्रस्तुति दी. उसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी मौजूद थीं. उन्होंने स्वयं गले लगाकर तीजन की सराहना की.
निर्माता निर्देशक श्याम बेनेगल का प्रसिद्ध टीवी शो था – ‘भारत एक खोज’ . उसके पांचवे एपिसोड से महाभारत की कथा प्रारंभ होती है. वर्ष 1988 में दूरदर्शन पर प्रदर्शित इस सीरियल में टीवी पर छा गई तीजन बाई. इसी के साथ पूरे देश में विख्यात हो गई पंडवानी और तीजन बाई.
तीजन को पंडवानी गायन के संस्कार नाना ब्रजलाल के अलावा उमेद सिंह देशमुख से मिले. तीजन रीतिकाल के महान कवि सबल सिंह चौहान की लिखी महाभारत की चौपाइयों और दोहों को गाती थीं.
*पंडवानी है क्या?*
कुरुक्षेत्र में लड़ा गया महाभारत युद्ध. कौरव पांडवों के मध्य लड़ा गया युद्ध. कुल 18 अक्षौहिणी सेनाओं के मध्य लड़ा गया युद्ध. अठारह दिनों तक चलने वाला युद्ध. रिश्ते नातों को ताक पर रख कर लड़ा गया युद्ध. शिष्य के द्वारा गुरु, भाई के द्वारा भाई, ताऊ चाचाओं द्वारा चक्रव्यूह रचकर भतीजे को मार दिए जाने वाला युद्ध. इन सबके पीछे श्रीकृष्ण की लीला. इसी पौराणिक कथा का गायन है पंडवानी.
*पंडवानी – पांडव वाणी अर्थात पांडवों की कथा*
पंडवानी में दो तरह की शैलियाँ विख्यात हैं – वेदमति शैली एवं कापालिक शैली. वेदमति शैली में बैठकर गायन करते हैं, जबकि कापालिक में खड़े होकर. तीजन बाई ने कापालिक शैली में खास कथन शैली विकसित की. तीजन तानपुरा लेकर मंच पर एक कोने से दूसरे कोने तक घूमती. वाद्ययंत्रों पर बैठे साथी कलाकारों के साथ संवाद करती हुई तीजन पौराणिक कथाओं को वर्तमान किस्सों से जोड़कर सुनाने लगी. यह शैली श्रोताओं को भाने लगी. तीजन बाई निडर थी किन्तु उतनी ही सहज भी.
भारत के हर कोने में , हर गांव में, वहाँ की स्थानीय भाषा में, लोकगीत गाए जाते हैं. उन लोकगीतों में छिपा होता है इतिहास. हमारे देश पर कितने ही आक्रमण हुए. हमारी नालंदा यूनिवर्सिटी से लेकर पुरानी तमाम पुस्तकें नष्ट कर दी गई. पर ना हमारी संस्कृति नष्ट हुई. ना हमारा इतिहास नष्ट हो सका. क्योंकि हमारी पुरातन संस्कृति और इतिहास हमारे गांवो के लोकगीतों में समाहित है. लोकगीत अपने आप में संस्कृति के वाहक हैं. इस सांस्कृतिक धरोहर को हम तक पहुँचाते हैं लोकगीतों के गायक . तीजन बाई इसी गौरवशाली परंपरा की ध्वजवाहक रहीं.
6 जून 2018 को तीजन बाई को हार्ट अटैक आया था. उन्हें आईसीयू में एडमिट कराया गया. वे ठीक होकर लौटी और पिछले कुछ माह पहले तक भी इस जीवट कलाकार के कार्यक्रम जारी रहे. तीजन बाई विदेशों में भारत की सांस्कृतिक राजदूत थीं. उन्होंने जापान, जर्मनी, इंग्लैंड, स्विट्जरलैंड, इटली, रूस, चीन इत्यादि चालीस से ज्यादा देशों में अपनी कला का प्रदर्शन किया.
लोकमत समाचार में वंदना अत्रे लिखती हैं कि मानो जितनी ऊंचाई तक हनुमान संजीवनी बूटी लाने के लिए द्रोणगिरि पर्वत को उठा कर उड़े थे. वृंदावन के कान्हा भी अपनी हथेली पर तीजन को बैठाकर उतनी ऊंचाइयों तक ले गए.
*सम्मान एवं पुरस्कार*
1988 – पद्मश्री
1995 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
2003 – पद्म भूषण
2003 – डी.लिट् (बिलासपुर विश्वविद्यालय)
2007 – नृत्य शिरोमणि पुरस्कार
2016 – एम. एस. सुब्बालक्ष्मी शताब्दी सम्मान
2018 – फुकुओका पुरस्कार, जापान
2019 – पद्म विभूषण


