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अस्तित्व के लिए संघर्षरत है जमशेदपुर की जीवनदायिनी स्वर्णरेखा –धर्मेंद्र कुमार

जमशेदपुर की पहचान सिर्फ़ इस्पात उद्योग से नहीं है बल्कि उसकी आत्मा स्वर्णरेखा नदी से भी जुड़ी है। यह शहर के पश्चिमी और दक्षिण-पूर्वी हिस्से से होकर बहती है और खरकाई नदी के साथ मिलकर जमशेदपुर को एक विशिष्ट भूगोल प्रदान करती है यह नदी दशकों से शहर की प्यास बुझाती रही खेतों को सींचती रही और जीवन का आधार बनी रही

अस्तित्व के लिए संघर्षरत है जमशेदपुर की जीवनदायिनी स्वर्णरेखा –धर्मेंद्र कुमार

जमशेदपुर- जमशेदपुर की पहचान सिर्फ़ इस्पात उद्योग से नहीं है बल्कि उसकी आत्मा स्वर्णरेखा नदी से भी जुड़ी है। यह शहर के पश्चिमी और दक्षिण-पूर्वी हिस्से से होकर बहती है और खरकाई नदी के साथ मिलकर जमशेदपुर को एक विशिष्ट भूगोल प्रदान करती है यह नदी दशकों से शहर की प्यास बुझाती रही खेतों को सींचती रही और जीवन का आधार बनी रही। स्वर्णरेखा मात्र एक नदी नहीं बल्कि जमशेदपुर की लाइफलाइन है। शहर के लिए जल का एक मात्र प्राकृतिक श्रोत स्वर्णरेखा आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। जिस नदी के बालू रुपी आंचल में कभी सोने के कण पाए जाते थे, आज वहीं नदी प्रदूषण और प्रशासनिक उदासीनता का दंश झेलने को अभिशप्त है।

औद्योगिक कचरे और नालों का बोझ
स्वर्णरेखा में कंपनियों का औद्योगिक अपशिष्ट और शहर की लगभग दर्जनभर नालियों का गंदा पानी सीधे गिरता है। नदी का जल धीरे-धीरे जहरीला होता जा रहा है। विडंबना यह है कि इस पर चर्चा तो खूब होती है। गंगा की तर्ज पर गंगा आरती जैसी कार्यक्रमों का आयोजन भी होता हैं। स्वर्णरेखा के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए प्रत्येक वर्ष नदी तट पर चर्चाएं भी होती है। लेकिन वास्तविक सफाई और संरक्षण का काम नगण्य है। वहीं एनजीटी के निर्देशों को ठेंगा दिखाते हुए नदी तट पर अवैध तरीके से रेस्टोरेंट एवं भव्य आवासीय कॉलोनियों का निर्माण जारी हैं। सवाल यह है कि इस मुद्दे पर जिला प्रशासन एवं तथाकथित पर्यावरणविद् और पर्यावरण को समर्पित एनजीओ मौनी बाबा बने हुए हैं।

स्वंयसेवकों बनाम तथाकथित पर्यावरणविद्

कुछ समर्पित स्वंयसेवक बिना शोर-शराबे के नदी को बचाने का प्रयास करते हैं। वहीं दूसरी ओर, कुछ तथाकथित “स्वयंभू पर्यावरणविद्” मीडिया कवरेज और बयानबाजी तक सीमित रहते हैं। हकीकत यह है कि यदि अब तक 10% भी ईमानदार प्रयास हुआ होता, तो नदी आज इस हालत में न होती।
एनजीओ और प्रशासन की भूमिका
कई एनजीओ एवं पर्यावरणविद् द्वारा समय-समय पर नदी के जल का नमूना लेकर प्रदूषण की जांच कराने की घोषणा की गई, मीडिया में खूब चर्चाएं हुईं। लेकिन जांच रिपोर्टें आज तक सार्वजनिक नहीं हुईं। प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। नदी तट पर एनजीटी के आदेशों का खुलेआम उल्लंघन करते हुए अवैध निर्माण कार्य जारी है। इसका नक्शा किस आधार पर पास किया गया और निर्माण कार्य की अनुमति किसने प्रदान की यह अपने आप में बड़ा प्रश्न है।
दिखावे के कार्यक्रम बनाम वास्तविक प्रयास
विश्व पर्यावरण दिवस पर विभिन्न संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, भाषण और फोटो सेशन होगा। लेकिन नदी की वास्तविक पीड़ा इन दिखावटी आयोजनों से दूर ही रहेगी। स्वर्णरेखा अपनी नियति पर आँसू बहाती रहेगी, जबकि जिम्मेदार लोग औपचारिकताओं में संतोष पा लेंगे।
स्वर्णरेखा सिर्फ़ एक नदी नहीं, बल्कि जमशेदपुर की जीवनरेखा है। यदि इसे बचाने के लिए ठोस कदम अभी नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां केवल इसके नाम से परिचित होंगी, प्रवाह से नहीं। हमें औद्योगिक कचरे पर सख्त नियंत्रण करना होगा। नालों के गंदे पानी को ट्रीटमेंट प्लांट से गुज़रने के बाद नदी में छोड़ना होगा। एनजीटी के आदेशों का पालन और अवैध निर्माण पर रोक लगाना होगा, ताकि नदी की प्रवाह बाधित ना हो। यही वे कदम हैं जो स्वर्णरेखा को पुनर्जीवित कर सकते हैं। अन्यथा यह नदी इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगी।

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