Welcome to न्यू झारखण्ड वाणी   Click to listen highlighted text! Welcome to न्यू झारखण्ड वाणी
Uncategorized

भारतीय रेल द्वारा टाटानगर उपेक्षा का शिकार

आदित्यपुर इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (AIADA) ने टाटा स्टील की अनुशंसा और स्थानीय उद्योगपतियों की सलाह पर वर्ष 1972–73 के आसपास साउथ ईस्टर्न रेलवे को टाटानगर स्टेशन से ट्रैक विस्तार के लिए प्रारंभिक सर्वेक्षण (Preliminary Survey) हेतु राशि जमा की थी

भारतीय रेल द्वारा टाटानगर उपेक्षा का शिकार

मेरी इस युक्ति से भले ही रेलवे प्रबंधन सहमत न हो, लेकिन जमशेदपुर की जनता, यहां के व्यवसायी, उद्यमी तथा आसपास के कॉरपोरेट घराने इससे कुछ हद तक अवश्य सहमत होंगे।
कालीमाटी स्टेशन का नाम बदलकर 1919 में ब्रिटिश सरकार के शासनकाल में टाटानगर स्टेशन रखा गया था—जहां तक मेरी जानकारी है। चक्रधरपुर रेल डिवीजन, साउथ ईस्टर्न रेलवे का सबसे अधिक राजस्व कमाने वाला डिवीजन है, और टाटानगर इसी डिवीजन के अंतर्गत आता है। इसके बावजूद, पिछले 50 वर्षों से टाटानगर स्टेशन में अपेक्षित विकास नहीं हुआ। कुछ महीनों पहले तक इसकी स्थिति लगभग वैसी ही थी।

मुझे स्मरण है कि आदित्यपुर इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (AIADA) ने टाटा स्टील की अनुशंसा और स्थानीय उद्योगपतियों की सलाह पर वर्ष 1972–73 के आसपास साउथ ईस्टर्न रेलवे को टाटानगर स्टेशन से ट्रैक विस्तार के लिए प्रारंभिक सर्वेक्षण (Preliminary Survey) हेतु राशि जमा की थी। इसके बाद साउथ ईस्टर्न रेलवे ने टाटा स्टील एवं अन्य तकनीकी विशेषज्ञों के सहयोग से अंतिम ट्रैक सर्वे (Final track Survey) भी किया, लेकिन कोई ठोस प्रगति लंबे समय तक दिखाई नहीं दी। हाल के 5 वर्षों में कुछ गतिविधियां अवश्य दिखी हैं।

टाटानगर से स्टील एक्सप्रेस और इस्पात एक्सप्रेस के शुरू होने पर लोगों में खुशी की लहर दौड़ी थी, क्योंकि हावड़ा के लिए सीधी ट्रेन सेवा शुरू हुई थी। टाटानगर यानी जमशेदपुर में टाटा समूह के उत्पादन का लगभग 30–35% हिस्सा यहां स्थित इकाइयों से आता है। विशाल आदित्यपुर इंडस्ट्रियल एरिया स्थापित है, और चाईबासा का खनिज क्षेत्र भी इस औद्योगिक ढांचे पर निर्भर है।

इसके बावजूद, ट्रेनों का समय पर न चलना एक गंभीर समस्या है। इस मुद्दे को लेकर सरयू राय तथा उनके समर्थकों, विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों द्वारा कई बार प्रदर्शन और आंदोलन किए गए, ताकि ट्रेनें समय पर चलें। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि इन प्रयासों के बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ, बल्कि कई बार ट्रेनें और अधिक विलंब से चलने लगी हैं।
टाटानगर से कांड्रा के बीच थर्ड लाइन का निर्माण कार्य चल रहा है, जिसके कारण कुछ विलंब स्वाभाविक है, परंतु यह विलंब मिनटों में होना चाहिए, घंटों में नहीं। अक्सर ट्रेनें घंटों देरी से चलती हैं, जो अत्यंत चिंताजनक है।
अफसोस की बात यह है कि टाटा स्टील, TRF, ISWP, टाटा मोटर्स जैसी बड़ी औद्योगिक इकाइयों के बावजूद, और उनके सहारे चलने वाले छोटे एवं मध्यम उद्योगों के बावजूद, जमशेदपुर और आसपास का वाणिज्यिक विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं हो पाया है।

टाटानगर स्टेशन से देश के प्रमुख व्यावसायिक शहरों जैसे दिल्ली, अहमदाबाद, जयपुर, चेन्नई (मद्रास), पुणे, हैदराबाद, बेंगलुरु के लिए कोई पर्याप्त सीधी ट्रेन सेवा उपलब्ध नहीं है। कई ट्रेनें इन शहरों के लिए गुजरती अवश्य हैं, लेकिन उनमें सीमित कोटा होने के कारण यात्रियों को कठिनाई होती है। ऐसे में वाणिज्यिक विकास की गति कैसे बढ़े, यह एक बड़ा प्रश्न है।
मैं भारतीय रेल मंत्री एवं रेलवे बोर्ड से आग्रह करता हूं कि टाटानगर से देश के प्रमुख शहरों के लिए सीधी ट्रेन सेवाएं शुरू की जाएं। अन्यथा, इस शहर का विकास बहुत धीमी गति से होता रहेगा। यहां न तो एयरपोर्ट की पर्याप्त सुविधा है और न ही सी-पोर्ट से कोई सीधा संपर्क है।

टाटा समूह की इकाइयों पर आश्रित रहकर कुछ हद तक औद्योगिक विकास और राजस्व वृद्धि तो संभव है, लेकिन व्यापक स्तर पर नियोजन, वाणिज्यिक विकास, सांस्कृतिक उन्नति और शैक्षणिक सुविधाओं का विस्तार संभव नहीं हो पाएगा।
मुझे विश्वास है कि जमशेदपुर की विभिन्न संस्थाएं, राजनीतिक दल, यहां के सांसद एवं विधायक इस गंभीर समस्या को समझेंगे और इसके समाधान के लिए ठोस पहल करेंगे।

ए के श्रीवास्तव अध्यक्ष जमशेदपुर सिटीजन फोरम

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!
Click to listen highlighted text!