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जनता पर अत्याचार कब तक सरकार ? -धर्मेंद्र कुमार

चुनाव बाद कीमत वृद्धि: जनता से छल विपक्ष महीनों से आगाह कर रहा था कि चुनाव समाप्त होते ही सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाएगी। तब सत्ता पक्ष ने इसे ‘झूठा प्रचार’ बताकर खारिज कर दिया और दावा किया कि स्थिति सामान्य है। चुनाव निपटते ही दामों में उछाल ने साबित कर दिया कि विपक्ष की आशंका सही थी। सवाल यह है कि सरकार ने सच छिपाकर जनता का विश्वास क्यों तोड़ा? क्या लोकतंत्र में पारदर्शिता की कोई जगह नहीं बची? भारत ने रूस से अंतरराष्ट्रीय बाजार से काफी कम दाम पर कच्चा तेल 2022-23 में बड़े पैमाने पर खरीदा और अपनी ऊर्जा लागत नियंत्रित रखी। लेकिन अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए सरकार ने धीरे-धीरे रूस से आयात लगभग बंद कर दिया। नतीजा हमें महंगा तेल खाड़ी देशों और अमेरिका से खरीदना पड़ रहा है

जनता पर अत्याचार कब तक सरकार ? -धर्मेंद्र कुमार

देश की जनता एक के बाद एक संकटों से जूझ रही है। कोविड-19 महामारी की मार से वह अभी पूरी तरह उबरी भी नहीं थी कि सरकार की नीतियों ने उसे फिर आर्थिक दलदल में धकेल दिया है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। यह वृद्धि केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि ट्रांसपोर्ट महंगा होने से सब्जी, अनाज, दूध से लेकर हर जरूरी वस्तु की कीमत आसमान छू रही है। महंगाई की यह आग सीधे रसोई तक पहुंच चुकी है।

चुनाव बाद कीमत वृद्धि: जनता से छल
विपक्ष महीनों से आगाह कर रहा था कि चुनाव समाप्त होते ही सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाएगी। तब सत्ता पक्ष ने इसे ‘झूठा प्रचार’ बताकर खारिज कर दिया और दावा किया कि स्थिति सामान्य है। चुनाव निपटते ही दामों में उछाल ने साबित कर दिया कि विपक्ष की आशंका सही थी। सवाल यह है कि सरकार ने सच छिपाकर जनता का विश्वास क्यों तोड़ा? क्या लोकतंत्र में पारदर्शिता की कोई जगह नहीं बची?
भारत ने रूस से अंतरराष्ट्रीय बाजार से काफी कम दाम पर कच्चा तेल 2022-23 में बड़े पैमाने पर खरीदा और अपनी ऊर्जा लागत नियंत्रित रखी। लेकिन अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए सरकार ने धीरे-धीरे रूस से आयात लगभग बंद कर दिया। नतीजा हमें महंगा तेल खाड़ी देशों और अमेरिका से खरीदना पड़ रहा है।
येही नहीं कुछ वर्ष पहले तक भारत ईरान से रुपये में तेल खरीदता था। भुगतान व्यवस्था ऐसी थी कि भारत ईरान को सामान निर्यात करके तेल का पैसा चुकाता था। इससे डॉलर की जरूरत नहीं पड़ती थी और रुपया भी स्थिर रहता था। अमेरिका के प्रतिबंधों के दबाव में सरकार ने ईरान से आयात पूरी तरह बंद कर दिया। आज जब खाड़ी संकट गहराया है, तो सस्ते विकल्प हमारे पास नहीं बचे। किसी भी समझदार देश के लिए रणनीतिक तेल भंडार यानी ‘स्ट्रैटेजिक रिजर्व’ संकट से निपटने का सबसे बड़ा हथियार होता है। खेदजनक है कि पिछले 12 वर्षों में सरकार ने देश के तेल रिजर्व में कोई ठोस बढ़ोतरी नहीं की। आज जब आपूर्ति श्रृंखला टूटी है, हमारे पास सिर्फ 9-10 दिन का रिजर्व है जबकि चीन के पास 90 दिन और अमेरिका के पास 200 दिन से ज्यादा का भंडार है। यह तैयारी की भारी कमी दर्शाता है।

सरकार ने दिए लॉकडाउन के संकेत
प्रधानमंत्री ने देशवासियों को संबोधित करते हुए देश पर आए संकट से निपटने के लिए देशहित में पेट्रोल औऱ डीजल के उपयोग कम करने की अपील की वहीं वर्क फॉर होम की बात कही। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट तौर पर संकेत दे दिया कि यदि हालात नहीं सुधरेंगे तो लॉकडाउन कासामना करना पड़ सकता है। जनता अभी पूरी तरह कोविड के दर्द से उबर नहीं पाई है। कोविड काल में लाखों लोगों ने रोजगार खोया, छोटे कारोबार बंद हो गए, बचत खत्म हो गई। परिवार अब भी कर्ज चुकाने में लगे हैं। ऐसे में सरकार द्वारा बार-बार ‘लॉकडाउन जैसी स्थिति’ के संकेत देना जनता के मानसिक और आर्थिक स्वास्थ्य पर दोहरी मार है।

रुपया कमजोर, नीतियां नाकाम
डॉलर के मुकाबले रुपये का लगातार गिरना सरकार की आर्थिक और विदेश नीति की विफलता को उजागर करता है। कमजोर रुपया आयात को महंगा बनाता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85% आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थिर रहने पर भी, कमजोर रुपये के कारण पेट्रोल-डीजल महंगा हो जाता है। यह सीधा-सीधा अदूरदर्शी आर्थिक प्रबंधन का परिणाम है। न निर्यात बढ़ाने की ठोस रणनीति दिखती है, न रुपये को संभालने की।

सरकार का जिम्मेदारी से पलायन
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि सरकार अपनी गलतियों को स्वीकार करने के बजाय हर संकट के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहरा देती है। महंगाई बढ़े तो ‘अंतरराष्ट्रीय कारण’, रुपया गिरे तो ‘वैश्विक हालात’, बेरोजगारी पर सवाल उठे तो ‘पिछली सरकारें’। यह पलायनवाद लोकतांत्रिक जवाबदेही के खिलाफ है। जनता ने जिन्हें ‘सेवक’ बनाकर देश चलाने की जिम्मेदारी दी थी, वे आज ‘सेवा का मेवा और मलाई’ चख रहे हैं। मंत्रियों के भत्ते, सुविधाएं, विज्ञापनों पर खर्च बरकरार है, लेकिन जनता से कहा जा रहा है कि ‘राष्ट्रनिर्माण’ के लिए त्याग करे।

क्या बोझ सिर्फ जनता उठाएगी?
देश को आर्थिक संकट से उबारने की जिम्मेदारी क्या केवल जनता की है? जब जनता टैक्स दे, महंगा तेल खरीदे, महंगाई सहे और फिर भी चुप रहे, तो सरकार की भूमिका क्या है? नीति निर्धारण, कूटनीतिक संतुलन, कर ढांचे में सुधार — ये सब सरकार के दायित्व हैं। यदि हर वैश्विक संकट का ठीकरा जनता के सिर फोड़ा जाएगा, तो ‘कल्याणकारी राज्य’ की अवधारणा का क्या अर्थ रह जाएगा?
आज जरूरत है कि सरकार अदूरदर्शी फैसलों और दोषारोपण की राजनीति छोड़कर जमीन पर उतरे। तेल पर अत्यधिक केंद्रीय करों में कटौती करे, रुपये को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाए, और जनता को विश्वास दिलाए कि संकट की घड़ी में वह अकेली नहीं है। वरना इतिहास यही दर्ज करेगा कि जब जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी, उसके ‘सेवक’ सत्ता के सुख भोग रहे थे।

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